भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 504

* अष्टावक्रगीता * ५०३


एकमात्र तुम ही हो, तुमसे भिन्न न तो कोई संसारी (जीव) है और न कोई असंसारी (ईश्वर) ॥ १६ ॥

भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥ १७॥

यह विश्व भ्रान्तिमात्र है। वस्तुतः कुछ नहीं है। जिसका ऐसा निश्चय हो गया है, उसकी वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। वह स्फूर्ति-मात्र रहता है, वह ‘न कुछ’ के समान निर्वाणका अनुभव करता है॥ १७॥

एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर॥ १८॥

इस संसार-समुद्रमें एक ही था, है और रहेगा। न तुम्हारा बन्धन है और न तो मोक्ष। तुम कृतकृत्य हो, सुखसे विचरो॥ १८॥

मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥ १९॥

हे चित्स्वरूप! संकल्प और विकल्पके द्वारा अपना चित्त क्षुब्ध मत करो। उपशम—शान्त हो जाओ और अपने आनन्दस्वरूप आत्मामें सुखसे रहो॥ १९॥

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥ २०॥

तुम कहीं भी किसीका भी ध्यान मत करो। कहीं कुछ भी हृदयमें धारण मत करो। तुम नित्य मुक्त आत्मा हो। विचार करके भी क्या करोगे॥ २०॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां तत्त्वोपदेशविंशतिकं नाम पञ्चदशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १५॥