गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 509, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८
- गीता-संग्रह *
शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च। न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ ९ ॥
जिसके लिये संसार-सागर सूख गया है, उसकी दृष्टि शून्य रहती है, चेष्टाएँ व्यर्थ हैं अथवा इन्द्रियाँ विकल हैं—इन बातोंमें न तो उसे स्पृहा है न तो विरक्ति ॥ ९ ॥
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति। अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १० ॥
बड़े आश्चर्यकी बात है कि मुक्तचित्त पुरुषकी कुछ विलक्षण ही अनिर्वचनीय-सी दशा होती है, वह न जागता है न सोता है, न आँखें खोलता है न मीचता है ॥ १० ॥
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः। समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ ११ ॥
मुक्तपुरुष सर्वत्र स्वस्थ रहता है। सर्वत्र उसका हृदय निर्मल रहता है। लेशमात्र भी वासना उसका स्पर्श नहीं कर सकती। वह सर्वत्र एक-सा शोभायमान होता है ॥ ११ ॥
पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन्। ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥
जीवन्मुक्त महापुरुष देखते, सुनते, छूते, सूँघते, भोगते, पकड़ते, बोलते और चलते हुए भी इच्छा एवं अनिच्छासे मुक्त ही रहता है। वास्तवमें वह मुक्त ही है ॥ १२ ॥
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति। न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥
मुक्तपुरुषको किसी भी (अनात्माके समान प्रतीयमान) वस्तुमें रस नहीं है। इसलिये वह निन्दा-स्तुति, हर्ष-क्रोध, दान और आदानसे सर्वथा रहित होता है ॥ १३ ॥