गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० * गीता-संग्रह *
विषयैः क्रकचैरेतत्संस्सृष्टं चक्रकं दृढम्।
जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलैः सुसंवृतम्॥ २१॥
विषयरूपी अरोंसे यह दृढ़ चक्र बना हुआ है और कर्मरूपी कीलोंसे अच्छी प्रकार जड़ा हुआ है, इस कारण साधारण मनुष्य इसके छेदन करनेमें समर्थ नहीं होते॥ २१॥
अतिदुःखं च वैराग्यं भोगाद्वैतृष्ण्यमेव च।
गुरुप्रसादः सत्सङ्ग उपायास्तज्जये अमी॥ २२॥
अतिशय दुःख, वैराग्य, भोगमें तृष्णाका त्याग, गुरुकी कृपा, सत्संग—ये इस (मन)-के जीतनेके उपाय हैं॥ २२॥
अभ्यासाद्वा वशीकुर्यान्मनो योगस्य सिद्धये।
वरेण्य दुर्लभो योगो विनास्य मनसो जयात्॥ २३॥
योगसिद्धिके निमत्त अभ्याससे मनको अपने वशमें करे, हे वरेण्य! बिना मनके जीते योग महाकठिन है॥ २३॥
वरेण्य उवाच
योगभ्रष्टस्य को लोकः का गतिः किं फलं भवेत्।
विभो सर्वज्ञ मे छिन्धि संशयं बुद्धिचक्रभृत्॥ २४॥
वरेण्य बोले—हे भगवन्! योगभ्रष्टको किस लोककी प्राप्ति होती है, उसकी क्या गति होती है और क्या फल होता है? हे सर्वज्ञ! हे बुद्धिरूपी चक्रको धारण करनेवाले! मेरे इस सन्देहका छेदन कीजिये॥ २४॥
श्रीगजानन उवाच
दिव्यदेहधरो योगाद् भ्रष्टः स्वभोगमुत्तमम्।
भुक्त्वा योगिकुले जन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले॥ २५॥
श्रीगणेशजी बोले—[हे राजन्!] योगभ्रष्ट पुरुष दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उत्तम सुख भोगकर पुनः शुद्ध