गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अष्टावक्रगीता * ५१७
एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम्।
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥
मूढ़ पुरुष बार-बार एकाग्रता तथा निरोधका अभ्यास करते रहते हैं। धीर पुरुष सुषुप्तके समान अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए कुछ भी कर्तव्यरूपसे नहीं देखते ॥ ३३ ॥
अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम्।
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥
मूढ़ पुरुष प्रयत्नसे अथवा प्रयत्न-त्यागसे शान्ति नहीं प्राप्त करता। प्रज्ञावान् पुरुष तत्त्वके निश्चयमात्रसे शान्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३४ ॥
शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम्।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ ३५ ॥
आत्माके सम्बन्धमें जो लोग अभ्यासमें लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय ब्रह्म-स्वरूपको बिलकुल ही नहीं जानते हैं ॥ ३५ ॥
नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥
अज्ञानी मनुष्य कर्मरूप अभ्यासके द्वारा मुक्ति नहीं पा सकता और ज्ञानी कर्मरहित होनेपर भी केवल ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥
मूढो नाप्नोति तद् ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति।
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥
अज्ञानीको ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता; क्योंकि वह ब्रह्म होना चाहता है (इच्छामात्र ही ब्रह्मत्वमें प्रतिबन्धक है)। ज्ञानी पुरुष इच्छा न करनेपर भी परब्रह्म-बोध-स्वरूप रहता है ॥ ३७ ॥