भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • अष्टावक्रगीता * ५२१

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरि‌गह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष महान् भोगोंमें विलास करते हैं और पर्वतोंकी गहन गुफाओंमें भी प्रवेश करते हैं, किंतु वे कल्पना, बन्धन एवं बुद्धि-वृत्तियोंसे मुक्त होते हैं॥ ५३॥

श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम्।
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष श्रोत्रिय, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा और प्रियको देखकर उनका सत्कार करता है, परंतु उसके हृदयमें कोई वासना नहीं होती है॥ ५४॥

भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः।
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥

सेवक, पुत्र, स्त्री, दौहित्र और सगोत्रके द्वारा हँसी उड़ाये जानेपर, धिक्कार देनेपर भी तत्त्वज्ञ-पुरुषके चित्तमें तनिक भी विकार नहीं होता॥ ५५॥

सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥

लोगोंकी दृष्टिसे प्रसन्न दीखनेपर भी वह प्रसन्न नहीं होता और खिन्न दीखनेपर भी खिन्न नहीं होता। उसकी उन आश्चर्यकारी दशाओंको वैसे लोग ही जानते हैं॥ ५६॥

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः।
शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥

कर्तव्यबुद्धिका नाम ही संसार है। विद्वान् लोग उस कर्तव्यताको ही नहीं देखते; क्योंकि वे शून्याकार, निराकार, निर्विकार एवं निरामय होते हैं॥ ५७॥

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