भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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५२४ * गीता-संग्रह *


बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥

बहुत कहनेसे क्या लाभ? तत्त्वज्ञ महापुरुष भोग और मोक्ष दोनोंके प्रति आकांक्षारहित होता है और सदा सर्वत्र रागरहित होता है ॥ ६८ ॥

महदादि जगद् द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥

महत्तत्त्वसे लेकर सम्पूर्ण द्वैत-रूप दृश्य जगत् नाममात्रका पसारा है। शुद्ध बोध-स्वरूप तत्त्वज्ञने जब इसका परित्याग ही कर दिया तब भला उसका क्या कर्तव्य शेष है? ॥ ६९ ॥

भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी । अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥

यह सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच भ्रममात्र है। यह कुछ नहीं है—ऐसे महानिश्चयसे सम्पन्न शुद्ध पुरुष दृश्यकी स्फूर्तिसे भी रहित हो जाता है और स्वभावसे ही शान्त हो जाता है ॥ ७० ॥

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः । क्व विधिः क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ ७१ ॥

जो शुद्ध स्फुरण-स्वरूप है, जिसे दृश्य सत्तावान् नहीं मालूम पड़ता, उसके लिये विधि क्या? वैराग्य क्या? त्याग क्या? और शान्ति क्या? ॥ ७१ ॥

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः । क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ ७२ ॥

जो अनन्त रूपसे स्वयं ही स्फुरित हो रहा है और प्रकृतिकी पृथक् सत्ताको नहीं देखता है, उसके लिये बन्ध कहाँ? मोक्ष कहाँ? हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ? ॥ ७२ ॥