गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० * गीता-संग्रह *
है, कायिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं हैं और वाचिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं है। मैं तो ज्ञानामृत, शुद्ध तथा इन्द्रियातीत हूँ॥८॥
मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम्। मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः॥९॥
मन आकाशके आकारवाला है, मनकी गति सभी ओर है, मन सबसे परे है और मन ही सब कुछ है, किंतु परमार्थकी दृष्टिसे मन कुछ भी नहीं है॥९॥
अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम्। पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम्॥१०॥
मैं एक हूँ और यह दृश्यमान सर्वरूप भी मैं ही हूँ। मैं आकाशसे भी अतीत हूँ तथा असीम हूँ। मैं इस आत्माको प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किस प्रकार देखूँ?॥१०॥
त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम्। सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे॥११॥
वस्तुतः तुम एक ही हो ऐसा क्यों नहीं समझते? सम्पूर्ण शरीरोंमें तुम (आत्मारूपसे) एक समान व्याप्त हो। तुम शाश्वत तथा अव्यय हो। हे प्रभो! तुम सर्वदा प्रकाशमान हो और भेदरहित हो। [निरन्तर प्रकाशमान होनेके कारण] तुम [उदयास्तरूप] दिन तथा रातको किस प्रकार मान सकते हो?॥११॥
आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम्। अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम्॥१२॥
[हे वत्स!] आत्मा (स्वयं)-को सर्वदा सर्वत्र एक तथा अनन्त