भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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* अवधूतगीता ( १ ) * ५४९


गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं स्वयं च तत्त्वं स्वयमेव शुद्धम् ॥ ४८ ॥

षडंगयोगसे भी आत्मा शुद्ध नहीं होता, मनका नाश होनेसे भी यह शुद्ध नहीं होता और गुरुके उपदेशसे भी यह शुद्ध नहीं होता; आत्मा तो परतत्त्व है और स्वयं शुद्ध ही है ॥ ४८ ॥

न हि पञ्चात्मको देहो विदेहो वर्तते न हि। आत्मैव केवलं सर्वं तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ ४९ ॥

आत्मा पाँच भूतोंसे निर्मित देह नहीं है और यह देहरहित भी नहीं है। वस्तुतः सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच आत्मा ही है, (आत्मासे भिन्न कुछ नहीं है) तब तीन अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) तथा तुरीयावस्था—ये कैसे हो सकती हैं? ॥ ४९ ॥

न बद्धो नैव मुक्तोऽहं न चाहं ब्रह्मणः पृथक्। न कर्ता न च भोक्ताहं व्याप्यव्यापकवर्जितः ॥ ५० ॥

मैं (आत्मा) बद्ध नहीं हूँ, मैं मुक्त भी नहीं हूँ और ब्रह्मसे पृथक् नहीं हूँ। मैं न तो कर्ता हूँ, न भोक्ता हूँ। मैं तो व्याप्य तथा व्यापक भावसे रहित हूँ ॥ ५० ॥

यथा जलं जले न्यस्तं सलिलं भेदवर्जितम्। प्रकृतिं पुरुषं तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ ५१ ॥

जिस प्रकार जलमें डाला गया जल समरूप (जलके रूपमें) हो जाता है, उसी प्रकार प्रकृति तथा पुरुष भी मुझे अभिन्नरूप ही प्रतीत होते हैं ॥ ५१ ॥

यदि नाम न मुक्तोऽसि न बद्धोऽसि कदाचन। साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ५२ ॥

यदि ऐसी बात है कि तुम मुक्त नहीं हो तो तुम कभी बद्ध भी नहीं हो। फिर तुम आत्माको साकार अथवा निराकार किस प्रकार