भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 553

५५२

  • गीता-संग्रह *

साकारं च निराकारं नेति नेतीति सर्वदा।
भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवः॥ ६२॥
स्थूल तथा सूक्ष्म जो भी सम्पूर्ण जगत् दृश्यमान है, वह नहीं है—नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। भेद-अभेदसे रहित तथा कल्याणस्वरूप एकमात्र आत्मतत्त्व ही सर्वदा विद्यमान है॥ ६२॥

न ते च माता च पिता च बन्धु-
र्न ते च पत्नी न सुतश्च मित्रम्।
न पक्षपातो न विपक्षपातः
कथं हि सन्तप्तिरियं हि चित्ते॥ ६३॥
तुम्हारी न तो माता है, न कोई पिता है, न बन्धु है, न पत्नी है, न पुत्र है, न मित्र है, न पक्षपाती है और विपक्षपाती भी नहीं है; तब तुम्हारे चित्तमें यह सन्ताप कैसा?॥ ६३॥

दिवानक्तं न ते चित्ते उदयास्तमयौ न हि।
विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयन्ति कथं बुधाः॥ ६४॥
[हे तात!] तुम्हारे (सदा प्रकाशमान) चेतनस्वरूपमें उदय तथा अस्त होनेवाले दिन तथा रात नहीं हैं। विद्वान् लोग देहरहित (आत्मतत्त्व)-के शरीरत्वकी कल्पना क्यों करते हैं?॥ ६४॥

नाविभक्तं विभक्तं च न हि दुःखसुखादि च।
न हि सर्वमसर्वं च विद्धि चात्मानमव्ययम्॥ ६५॥
आत्मा न तो विभक्त है और न अविभक्त, यह सुख-दुःखसे भी युक्त नहीं है, यह न तो पूर्ण है और न अपूर्ण; इस (द्वन्द्वरहित) शाश्वत आत्माको जानो॥ ६५॥

नाहं कर्ता न भोक्ता च न मे कर्म पुराधुना।
न मे देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम्॥ ६६॥
मैं न तो [कर्मोंका] कर्ता हूँ और न [उनके फलोंका] भोग