गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता ( १ ) * ५५७
देवताओंके द्वारा पूजित हूँ। सम्यक् रूपसे पूर्ण होनेके कारण मैं देवता आदिके विभागको ग्रहण नहीं करता हूँ (अर्थात् अपनेसे भिन्न नहीं समझता) ॥ ६॥
प्रमादेन न सन्देहः किं करिष्यामि वृत्तिमान्। उत्पद्यन्ते विलीयन्ते बुद्बुदाश्च यथा जले॥ ७॥
क्या मैं प्रमादवश अन्तःकरणकी वृत्तियोंवाला बनता हूँ (नहीं)। निःसन्देह वृत्तियाँ तो (मुझमें वैसे ही) स्वतः उत्पन्न होती हैं और पुनः विलीन हो जाती हैं; जैसे बुलबुले जलमें (सहज) उत्पन्न होते हैं और उसीमें विलीन हो जाते हैं॥ ७॥
महदादीनि भूतानि समाप्यैवं सदैव हि। मृदुद्रव्येषु तीक्ष्णेषु गुडेषु कटुकेषु च॥ ८॥ कटुत्वं चैव शैत्यत्वं मृदुत्वं च यथा जले। प्रकृतिः पुरुषस्तद्वद्भिन्नं प्रतिभाति मे॥ ९॥
जिस प्रकार मृदु द्रव्योंमें मृदुता, तीक्ष्ण द्रव्योंमें तीक्ष्णता, गुड़ आदि मधुर द्रव्योंमें मधुरता तथा कटु द्रव्योंमें कटुत्व और जलमें शीतलता तथा मृदुत्व अपने-अपने पदार्थोंमें अभेद रूपसे विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार महत्-अहंकार आदि तत्त्वोंसे लेकर स्थूल महाभूतपर्यन्त सबका अपने कारणोंमें लय करके जो सम्पूर्ण तत्त्वोंकी कारणभूत प्रकृति है, वह भी पुरुषमें विलीन हो जाती है; अतः प्रकृति तथा पुरुष मुझे भेदरहित प्रतीत होते हैं॥ ८-९॥
सर्वाख्यारहितं यद्वत्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं परम्। मनोबुद्धीन्द्रियातीतमकलङ्कं जगत्पतिम्॥ १०॥ ईदृशं सहजं यत्र अहं तत्र कथं भवेत्। त्वमेव हि कथं तत्र कथं तत्र चराचरम्॥ ११॥
वह चैतन्य ब्रह्म सम्पूर्ण संज्ञाओंसे रहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म,