गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता (१)* ५६३
यस्य स्वरूपात्सचराचरं जग- दुत्पद्यते तिष्ठति लीयतेऽपि वा। पयोविकारादिव फेनबुद्बुदा- स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३४॥
जिसके स्वरूपसे चराचर सम्पूर्ण जगत् जलके विकारसे फेन तथा बुद्बुदोंकी भाँति उत्पन्न होता है, उसीमें स्थिर रहता है और अन्तमें उसीमें विलीन हो जाता है; उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३४॥
नासानिरोधो न च दृष्टिरासनं बोधोऽप्यबोधोऽपि न यत्र भासते। नाडीप्रचारोऽपि न यत्र किञ्चित् तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३५॥
जिसमें प्राणायाम, दृष्टिसंयम, आसन, ज्ञान अथवा अज्ञान कुछ भी नहीं भासता और जिसमें नाड़ियोंकी गतिविधि भी नहीं है, उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३५॥
नानात्वमेकत्वमुभत्वमन्यता अणुत्वदीर्घत्वमहत्त्वशून्यता। मानत्वमेयत्वसमत्ववर्जितं तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३६॥
जिसमें अनेकत्व, एकत्व, उभयत्व, अन्यताभाव, अणुत्व, दीर्घत्व, महत्त्व और शून्यता—ये सब नहीं है; जो मान, मेय और समत्वसे रहित है, उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३६॥
सुसंयमी वा यदि वा न संयमी सुसंग्रही वा यदि वा न संग्रही।