गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता ( १ ) * ५६७
भी कैसे कहूँ? इसी प्रकार इसे नित्य अथवा अनित्य भी कैसे कहूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥५॥
स्थूलं हि नो नहि कृशं न गतागतं हि आद्यन्तमध्यरहितं न परापरं हि। सत्यं वदामि खलु वै परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥६॥
आत्मा न स्थूल है, न सूक्ष्म है और न तो गमनागमनवाला ही है; यह आदि, अन्त और मध्यसे रहित है; यह पर अथवा अपर भी नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ कि मैं परमार्थ तत्त्व-स्वरूप हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥६॥
संविद्धि सर्वकरणानि नभोनिभानि संविद्धि सर्वविषयांश्च नभोनिभांश्च। संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥७॥
तुम समस्त इन्द्रियोंको आकाशतुल्य शून्य जानो तथा सभी विषयोंको आकाशतुल्य शून्य जानो। आत्माको विशुद्ध जानो; यह बन्धन तथा मुक्तिसे युक्त नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥७॥
दुर्बोधबोधगहनो न भवामि तात दुर्लक्ष्यलक्ष्यगहनो न भवामि तात। आसन्नरूपगहनो न भवामि तात ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥८॥
हे तात! मैं दुर्बोध हूँ, किंतु अति कठिनतासे जाना जानेवाला भी नहीं हूँ, मैं दुर्लक्ष्य हूँ, किंतु कठिनाईसे दिखायी देनेवाला भी नहीं हूँ, मैं अति समीप हूँ और अपनेको छिपाता नहीं हूँ। मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥८॥