गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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सन्तापदुःखजनको न विधिः कदाचित् सन्तापयोगजनितं न मनः कदाचित्। यस्मादहङ्कृतिरियं न च मे कदाचि- ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १५॥
सन्ताप तथा दुःखको उत्पन्न करनेवाली जो विधि है, वह मेरे लिये कभी नहीं है, सन्तापके सम्बन्धसे उत्पन्न जो संकल्परूप मन है, वह भी मेरा कभी नहीं है और जो यह अहंकार है, वह भी मुझमें कभी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १५॥
निष्कम्पकम्पनिधनं न विकल्पकल्पं स्वप्नप्रबोधनिधनं न हिताहितं हि। निःसारसारनिधनं न चराचरं हि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १६॥
मैं कम्परहित और कम्पयुक्त दोनोंका नाशरूप नहीं हूँ, मैं विकल्प तथा कल्परूप भी नहीं हूँ, मैं स्वप्न और जाग्रत्का नाशरूप भी नहीं हूँ, मैं हित तथा अहितरूप भी नहीं हूँ, मैं निःसार तथा सारका नाशरूप नहीं हूँ और मैं चर और अचररूप भी नहीं हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १६॥
नो वेद्यवेदकमिदं न च हेतुतर्क्यं वाचामगोचरमिदं न मनो न बुद्धिः। एवं कथं हि भवतः कथयामि तत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १७॥
यह आत्मस्वरूप चेतन ब्रह्म न ज्ञानका विषय है और न जाननेवाला ही है, यह वाणीसे अगम्य है, इसे न मन जान सकता है और न बुद्धि ही जान सकती है; इस प्रकारके आत्मतत्त्वका वर्णन मैं