गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 578, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता ( १ ) * ५७७
[वास्तविक] स्वरूप नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारा रूप नष्ट होनेवाला नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, आयु आदि भी तुम्हारे नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३५ ॥
किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि किं नाम रोदिषि सखे न च ते मनांसि। किं नाम रोदिषि सखे न तवेन्द्रियाणि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३६॥
हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, आयु आदि तुम्हारे नहीं हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, मन आदि भी तुम्हारे नहीं हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, इन्द्रियाँ भी तुम्हारी नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३६ ॥
किं नाम रोदिषि सखे न च तेऽस्ति कामः किं नाम रोदिषि सखे न च ते प्रलोभः। किं नाम रोदिषि सखे न च ते विमोहो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३७॥
हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें कामना नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें लोभ नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें मोह नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३७॥
ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते धनानि ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते हि पत्नी।