गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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न हि मोहविमोहविकार इति
न हि लोभविलोभविकार इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम्॥ २१॥
उस आत्मामें मोह तथा विमोहका विकार नहीं है; उसमें लोभ तथा अलोभका भी विकार नहीं है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो निश्चय ही उसमें विचार तथा अविचारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ २१॥
त्वमहं न हि हन्त कदाचिदपि
कुलजातिविचारमसत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २२॥
अहो, 'तुम' और 'मैं' इस प्रकारका भेद कभी नहीं है; कुल तथा जातिका विचार भी सत्य नहीं है। मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ ? ॥ २२ ॥
गुरुशिष्यविचारविशीर्ण इति
उपदेशविचारविशीर्ण इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २३॥
वह चेतन आत्मा गुरु तथा शिष्यभावके विचारसे रहित है; वह उपदेश और तर्ककी भावनासे भी रहित है। मैं ही कल्याणस्वरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ?॥ २३॥
न हि कल्पितदेहविभाग इति
न हि कल्पितलोकविभाग इति।