गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ६१
सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित आयुध धारण किये उनके शरीरमें राजाने अलग-अलग तीनों लोक देखे ॥ ६-७ ॥
वरेण्य उवाच
दृष्ट्वैश्वरं परं रूपं प्रणम्य स नृपोऽब्रवीत्।
वीक्षेऽहं तव देहेऽस्मिन् देवानृषिगणान् पितॄन्॥ ८॥
यह ईश्वरका परम रूप देख प्रणाम करके राजा (वरेण्य) बोले—हे भगवन्! मैं आपकी इस देहमें देवता-ऋषिगण और पितरोंको देख रहा हूँ॥ ८॥
पातालानां समुद्राणां द्वीपानां चैव भूभृताम्।
महर्षीणां सप्तकं च नानार्थैः सङ्कुलं विभो ॥ ९॥
हे विभो! मैं सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात महर्षि और अनेक पदार्थोंके समूह देख रहा हूँ॥ ९॥
भुवोऽन्तरिक्षं स्वर्गांश्च मनुष्योरगराक्षसान्।
ब्रह्मविष्णुमहेशेन्द्रान् देवाञ्जन्तूननेकधा ॥ १० ॥
मैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, देवता और अनेक प्रकारके जन्तुओंको देख रहा हूँ॥ १०॥
अनाद्यनन्तं लोकादिमनन्तभुजशीर्षकम्।
प्रदीप्तानलसङ्काशमप्रमेयं पुरातनम् ॥ ११ ॥
मैं अनादि, अनन्त, लोकादि, अनन्त भुजा और सिरोंसे युक्त तथा जलती हुई अग्निके समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन आपको देख रहा हूँ॥ ११॥
किरीटकुण्डलधरं दुर्निरीक्ष्यं मुदावहम्।
एतादृशं च वीक्षे त्वां विशालवक्षसं प्रभुम् ॥ १२ ॥
मैं किरीट-कुण्डल धारण किये, कठिनाईसे देखनेयोग्य, आनन्ददायक तथा विशाल वक्षःस्थलयुक्त आप प्रभुका दर्शन कर रहा हूँ॥ १२॥