गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ६३
वे अनेक योनियोंको भोगकर अन्तमें आपमें ही उसी प्रकार प्रवेश करते हैं, जैसे सागरसे उत्पन्न हुए मेघके जलबिन्दु फिर उसीमें लीन होते हैं॥ १८॥
त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमश्चैव निर्ऋतिर्वरुणो मरुत् ॥ १९॥
गुह्यकेशस्तथेशानः सोमः सूर्योऽखिलं जगत्।
नमामि त्वामतः स्वामिन् प्रसादं कुरु मेऽधुना ॥ २० ॥
इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, सोम, सूर्य और सम्पूर्ण जगत्—यह सब आप ही हैं, हे स्वामिन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरे ऊपर अब कृपा करें॥ १९-२०॥
दर्शयस्व निजं रूपं सौम्यं यत्पूर्वमीक्षितम्।
को वेद लीलास्ते भूमन् क्रियमाणा निजेच्छया ॥ २१॥
आप मेरेद्वारा पूर्वमें देखा हुआ अपना सौम्य रूप मुझे दिखाइये, हे भूमन्! अपनी इच्छासे क्रीडा करनेवाले आपकी लीलाको कौन जान सकता है? ॥ २१॥
अनुग्रहान् मया दृष्टमैश्वरं रूपमीदृशम्।
ज्ञानचक्षुर्यतो दत्तं प्रसन्नेन त्वया मम॥ २२॥
आपकी कृपासे मैंने इस प्रकारका ऐश्वर्यशाली रूप देखा; क्योंकि आपने प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये थे॥ २२॥
श्रीगजानन उवाच
नेदं रूपं महाबाहो मम पश्यन्त्ययोगिनः।
सनकाद्या नारदाद्याः पश्यन्ति मदनुग्रहात् ॥ २३ ॥
श्रीगणेशजी बोले—हे महाबाहु! योग न करनेवाले इस मेरे रूपका कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि तथा नारदादि मेरे अनुग्रहसे इस रूपका दर्शन करते हैं॥ २३॥