भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ६५

असि त्वं सर्ववित्साक्षी भूतभावन ईश्वरः।
अतस्त्वां परिपृच्छामि वद मे कृपया विभो ॥ २ ॥

हे विभो ! आप सब जाननेवाले, सबके साक्षी, भूतभावन ईश्वर हैं, इस कारण मैं आपसे पूछता हूँ, आप कृपाकर कहिये ॥ २ ॥

श्रीगजानन उवाच

यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिषेवते।
स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ॥ ३ ॥

श्रीगणेशजी बोले—जो भक्त मूर्तिमान् मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करता है, वह हृदयमें मुझे धारण करनेवाला अनन्य भक्तिमान् मुझे [विशेष] मान्य है ॥ ३ ॥

खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत्।
ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटगं स्थिरम् ॥ ४ ॥
सोऽपि मामेत्यनिर्देश्यं मत्परो य उपासते।
संसारसागरादस्मादुद्धरामि तमप्यहम् ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके सब प्राणियोंका हित करता हुआ जो अक्षर, अव्यक्त, सर्वव्यापी और कूटस्थ स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है तथा जो जाननेमें अशक्य मेरी उपासना करता है, वह भी मुझे ही प्राप्त करता है, उसका भी मैं संसारसागरसे उद्धार करता हूँ ॥ ४-५ ॥

अव्यक्तोपासनादुःखमधिकं तेन लभ्यते।
व्यक्तस्योपासनात्साध्यं तदेवाव्यक्तभक्तितः ॥ ६ ॥

अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश भोगना पड़ता है। जो व्यक्तस्वरूपकी भक्तिसे प्राप्त होता है, वही अव्यक्तकी उपासनासे होता है ॥ ६ ॥

भक्तिश्चैवादरश्चात्र कारणं परमं मतम्।
सर्वेषां विदुषां श्रेष्ठो ह्यकिञ्चिज्ज्ञोऽपि भक्तिमान् ॥ ७ ॥

थोड़ा जाननेवाला भी यदि भक्तिमान् हो तो वह सम्पूर्ण विद्वानोंमें श्रेष्ठ है। इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है ॥ ७ ॥

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