गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें* जीवनमुक्तगीता * ६७१
हृदि ध्यानेन पश्यन्ति प्रकाशं क्रियते मनः।
सोऽहं हंसेति पश्यन्ति जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१७॥
जो साधक अपने हृदयमें उस परमतत्त्वका 'सोऽहं—हंसः' रूपसे ध्यानकरते हैं तथा अपने चित्तको उससे प्रकाशित करते हैं, वे जीवन्मुक्त कहे जाते हैं॥१७॥
शिवशक्तिसमात्मानं पिण्डब्रह्माण्डमेव च।
चिदाकाशं हृदं मोहं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१८॥
अपनी आत्माको शिव-शक्तिरूप परमात्मतत्त्व जानकर और अपने शरीर तथा ब्रह्माण्डको समान जानता हुआ जो हृदयस्थित मोहको चिदाकाशमें विलीन कर देता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१८॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिञ्च तुरीयावस्थितं सदा।
सोऽहं मनो विलीयेत जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१९॥
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीयावस्थामें रहते हुए भी जिसका मन सदा सोऽहं (मैं वही परमात्मतत्त्व हूँ)-के भावमें मग्न रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१९॥
सोऽहं स्थितं ज्ञानमिदं सूत्रेषु मणिवत्परम्।
सोऽहं ब्रह्म निराकारं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥२०॥
मैं वही निराकार ब्रह्म हूँ—इस सोऽहं ज्ञानधारामें जो उसी प्रकार निरन्तर स्थित रहता है, जैसे पिरोयी गयी मणिमालामें सूत्र निरन्तर विद्यमान रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥२०॥
मन एव मनुष्याणां भेदाभेदस्य कारणम्।
विकल्पनैव संकल्पो जीवन्मुक्तः स उच्यते॥२१॥
विकल्प और संकल्पात्मक मन ही मनुष्योंके भेद और ऐक्यका