गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ६७
कर्मोंके फलका त्याग करो ॥ १३ ॥
श्रेयसी बुद्धिरवृत्तेस्ततो ध्यानं परं मतम्।
ततोऽखिलपरित्यागस्ततः शान्तिर्गरीयसी ॥ १४ ॥
प्रथम मुझमें बुद्धि लगना श्रेष्ठ है, उससे ध्यान श्रेष्ठ है, उससे सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति है ॥ १४ ॥
निरहं ममताबुद्धिरद्वेषः करुणा समः।
लाभालाभे सुखे दुःखे मानामाने स मे प्रियः ॥ १५ ॥
जो अहंकारका त्याग करनेवाला, ममता बुद्धिसे रहित, द्वेष न करनेवाला, सबमें करुणा रखनेवाला और लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, मान-अपमानमें एक दृष्टि रखनेवाला है, वह मेरा प्रिय है ॥ १५ ॥
यं वीक्ष्य न भयं याति जनस्तस्मान्न च स्वयम्।
उद्वेगभीः कोपमुद्वीरहितो यः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
जिसको देखकर किसीको भय नहीं होता और जो मनुष्योंसे भययुक्त नहीं होता है; उद्वेग, भय, क्रोध और हर्षसे जो रहित हो, वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥
रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत्।
मौनी निश्चलधीभक्तिरसङ्गः स च मे प्रियः ॥ १७ ॥
शत्रु-मित्र, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोकमें जिसका चित्त एक है, जो मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान् और असंग है, वह मेरा प्रिय है ॥ १७ ॥
संशीलयति यश्चैनमुपदेशं मया कृतम्।
स वन्द्यः सर्वलोकेषु मुक्तात्मा मे प्रियः सदा ॥ १८ ॥
जो मेरे इस उपदेशका पालन करता है, वह त्रिलोकीमें नमस्कारके योग्य है और वह मुक्तात्मा मेरा सदा प्रिय है ॥ १८ ॥
अनिष्टाप्तौ च न द्वेष्टीष्टप्राप्तौ न च तुष्यति।
क्षेत्रतज्ज्ञौ च यो वेत्ति स मे प्रियतमो भवेत् ॥ १९ ॥
जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता