गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ६९
सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादिमें दोषदृष्टि, समदृष्टि, दृढ़भक्ति, एकान्तता तथा शम-दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन्! उसीको यथार्थ ज्ञान समझो ॥ २४-२५॥
तज्ज्ञानविषयं राजन् ब्रवीमि त्वं शृणुष्व मे। यज्ज्ञात्वेति च निर्वाणं मुक्त्वा संसृतिसागरम्॥ २६॥
हे राजन्! इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूँ, तुम श्रवण करो, जिसके जाननेसे संसारसागरसे छूटकर मुक्त हो जाओगे ॥ २६॥
यदनादीन्द्रियैर्हीनं गुणभुग्गुणवर्जितम्। अव्यक्तं सदसद्भिन्नमिन्द्रियार्थावभासकम्॥ २७॥ विश्वभृच्चाखिलव्यापि त्वेकं नानेव भासते। बाह्याभ्यन्तरतः पूर्णमसङ्गं तमसः परम्॥ २८॥
जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्-रज-तम आदि गुणोंका भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत्से परे तथा इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक है। विश्वको धारण करनेवाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर अनेक रूपसे भासता है, वह बाहर-भीतरसे पूर्ण, असंग और अन्धकारसे परे है ॥ २७-२८॥
दुर्ज्ञेयं चादिसूक्ष्मत्वादीप्तानामपि भासकम्। ज्ञेयमेतादृशं विद्धि ज्ञानगम्यं पुरातनम्॥ २९॥
अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाला है, इस प्रकार ज्ञानसे जाननेयोग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९॥
एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः। गुणान् प्रकृतिजान् भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः॥ ३०॥
यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा प्रकृतिसे परे पुरुष कहलाता है। यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको भोगता है ॥ ३०॥