गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभिक्षुगीता
[श्रीमद्भागवतमहापुराणके एकादश स्कन्धमें भिक्षुगीता प्राप्त है। इसमें भगवान् श्रीकृष्णने अपने परमसखा उद्धवजीको एक भिक्षुके प्राचीन आख्यानके माध्यमसे मनोजयके उपाय समझाये हैं। यदि दुर्जन लोग मनको क्षुब्ध करनेवाले आचरण भी करें तो भी मुमुक्षु मनुष्यको उद्वेलित न होकर उन्हें पूर्ण क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि सुख अथवा दुःखका कारण कोई और नहीं अपितु मन ही है। यही मोहासक्त मन जीवको कर्मबन्धनमें डालता है। इस मनका किसी भी प्रकार एकाग्र होकर भगवान्में लग जाना ही परम योग है। मार्मिक ज्ञानोपदेशवाली यह साधकोपयोगी भिक्षुगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]
बादरायणिरुवाच
स एवमाशंसित उद्धवेन
भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः ।
सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द-
स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—[परीक्षित्!] वास्तवमें भगवान्की लीलाकथा ही श्रवण करनेयोग्य है। वे ही प्रेम और मुक्तिके दाता हैं। जब उनके परमप्रेमी भक्त उद्धवजीने इस प्रकार प्रार्थना की, तब यदुवंशविभूषण श्रीभगवान्ने उनके प्रश्नकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच
बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनैरितैः ।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे सन्त पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे