गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १४२ ऐसे अगाध बोध रावरे सनेह-बस, बिकल बिलोकति, दुचितई सही है। कामधेनु-कृपा हुलसानी तुलसीस उर, पन-सिसु हेरि, मरजाद बाँधी रही है ॥ ४ ॥ इस समय जनकजीने जो बात कही उसकी साधु पुरुषोंने सराहना की तथा उसे रामचन्द्रजीको प्रिया और विश्वामित्रजीको अभिमत जान अन्य नीच राजाओंकी पंक्ति बिना आगके ही जल गयी ॥ १ ॥ तब गाधिनन्दन विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर रघुनाथजी से कहा—'महाराज जनककी गति बड़ी अग्राह्य है, वह वाणीसे ग्रहण नहीं की जा सकती। राजा तो अनेक देखे सुने हैं, किन्तु वे सब झूठे और नाममात्रके ही हैं। सच्चे तो एकमात्र तिरहुतनाथ महाराज जनक ही हैं—इस विषयमें सारी पृथ्वी साक्ष्य दे रही है ॥ २ ॥ इनका चित्त रागी होनेपर भी विरागी तथा भोग भोगनेयोग्य होकर भी योगयुक्त है। इन्होंने योगी याज्ञवल्क्यकी कृपासे सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर ली है। ये न तो सूर्यसे संतप्त होते हैं और न चन्द्रमासे शीतल ही होते हैं। इन्होंने तो उपाधिरहित सहज समाधिका निर्वाह कर लिया है ॥ ३ ॥ ऐसे अगाधबोधसम्पन्न होकर भी तुम्हारे स्नेहवश ये ऐसे व्याकुल दिखायी देते हैं, मानो अत्यन्त चिन्ता सहन की हो। [गुरुजीका यह कथन सुन] तुलसीदासजीके प्रभुके हृदयमें कृपारूप कामधेनु महाराज जनकके प्रणरूप वत्सको देखकर अति हुलसित हुई। किन्तु [गुरुकी आज्ञारूप] मर्यादामें बँधी रह गयी [अर्थात् उन्होंने गुरुजीकी आज्ञाके बिना धनुर्भङ्ग नहीं किया] ॥ ४ ॥ [ ८८ ] ऋषिराज ! राजा आजु जनक समान को ? आपु यहि भाँति प्रीति सहित सराहित, रागी औ बिरागी बड़भागी ऐसो आन को ? ॥ १ ॥