भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

गीतावली २३८ महाराज दशरथने जब सुना कि सुमन्त अयोध्यामें लौट आया है तो इस उत्कण्ठासे कि 'देखें प्राणनाथ रामकी क्या दशा सुनाता है, वे व्याकुल होकर उठ दौड़े ॥ १ ॥ फिर मन्त्रीको अत्यन्त व्याकुल होकर अपने चरणोंमें गिरते देख राजाने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और मन्त्रीने भी महाराज दशरथकी वह दीनदशा देखकर, भगवान्‌ने जो संन्देश भेजा था, उसके विषयमें कुछ भी न कहा ॥ २ ॥ महाराज भी अपने प्रियतम पुत्रकी कुशल नहीं पूछ सकते थे, क्योंकि उनके हृदयमें तो यही पछतावा था कि मुझे धिक्कार है जो विधाताने सचमुच ही पुत्रका वियोग सुननेके लिये मुझे जीवित रक्खा है ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, [महाराज दशरथ कहने लगे—] 'प्रभुने मुझे निष्ठुर जानकर मेरा जो परित्याग किया, वह उचित ही है।' और फिर 'हा रघुनाथ !' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो कोई मछली जलसे पृथक् कर दी गयी हो ॥ ४ ॥ [ ५७ ] मुएहु न मिटंगो मेरो मानसिक पछिताउ । नारिबस न बिचारि कीन्हौं काज, सोचत राउ ॥ १ ॥ तिलकको बोल्यो, दिये बन, चौगुनो चित चाउ । हृदय दाड़िम ज्यों न बिदरयो समुझि सील-सुभाउ ॥ २ ॥ सीय-रघुबर-लषन बिनु भय भभरि भगी न आउ । मोहि बूझि न परत, यातें कौन कठिन कुघाउ ॥ ३ ॥ सुनि सुमंत ! कि आनि सुंदर सुवन सहित जिआउ । दास तुलसी नतरु मोको मरन अमिय पिआउ ॥ ४ ॥ महाराज दशरथ सोचते हैं—'मैंने स्त्रीके वशीभूत होकर सोच- समझकर काम नहीं किया; इससे प्राप्त हुआ मेरा मानसिक पश्चात्ताप