भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 349

३४३ सुन्दरकाण्ड धारण करनेवाले परम धीर रघुवंशी वीर हैं ॥ २ ॥ मैं राक्षसराज रावणका भाई हूँ, मेरा नाम विभीषण है, मैं भाईके तिरस्कारसे उत्पन्न हुई महान् ग्लानिसे गला जा रहा हूँ हे पतितपावन ! हे प्रणतपाल ! हे करुणासिन्धो ! आप मुझे लक्ष्मणजीद्वारा सेवित अपने चरणोंमें आश्रय दीजिये' ॥ ३ ॥ विभीषणके ये दीनता और प्रीतिसे सने हुए मधुर वचन सुनकर प्रभुका शरीर प्रेमसे पुलकित हो गया और नेत्रोंमें जल भरने लगा। तब दीनोंके दुःख दोष और दरिद्रता दूर करनेवाले प्रभुने उन्हें 'लङ्केश' कहकर बुलाया और भुजाओंमें भर आलिंगन कर उनका राजतिलक कर दिया ॥ ४ ॥ विभीषण जातिका राक्षस और अपना शत्रु होनेसे सब प्रकार त्याज्य था, तब मङ्गलकर्ता श्रीहरिने उसे सब प्रकार कल्याणका पात्र कर दिया । तुलसीदासजी कहते हैं, रघुवंशमणि भगवान् राम बड़े ही दयालुचित्त हैं; उन्होंने 'रक्षा करो' ऐसा कहते ही किसे दूसरों- को तारनेवाला नहीं बना दिया? ॥ ५ ॥ [ ४४ ] दीन-हित बिरद पुराननि गायो । आरत-बंधु, कृपालु, मृदुल-चित जानि सरन हौं आयो ॥ १ ॥ तुम्हरे रिपुको अनुज बिभीषन, बंस निसाचर जायो । सुनि गुन-सील-सुभाउ नाथको मैं चरननि चितु लायो ॥ २ ॥ जानत प्रभु दुख-सुख दासनिको, तातें कहि न सुनायो । करि करुना भरि नयन बिलोकहु, तब जानौं अपनायो ॥ ३ ॥ बचन बिनीत सुनत रघुनायक हँसि करि निकट बुलायो । भेट्यो हरि भरि अंक भरत-ज्यों, लंकापति मन भायो ॥ ४ ॥ करपंकज सिर परसि अभय कियो, जनपर हेतु दिखायो । तुलसिदास रघुबीर भजन करि को न परमपद पायो ? ॥ ५ ॥