गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३६० और उसे दो बड़े सर्प समझाते हों ॥ ३ ॥ प्रभुके मस्तकपर तिलक शोभायमान है, उनके नेत्र कमलके समान हैं, पलक तथा भ्रुकुटी बड़ी मनोहर हैं, सुन्दर नासिका साक्षात् तोतेकी चोंचके समान है, ठोड़ी बड़ी सुन्दर है, अधर अरुणवर्ण हैं, दाँतोंकी कान्ति बड़ी सुहावनी है, वाणी गम्भीर है तथा मृदुल मुसकान संसृति-संतापका शमन करनेवाली है ॥ ४ ॥ भगवान्के कानोंमें कुण्डल हैं, उन्होंने निर्मल कपोलोंको विभूषित कर उनपर एक और ही प्रकारकी चञ्चल और मनोहर कान्ति फैला दी है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो दो सुनहरे मकर चन्द्रमाकी सुमधुर किरणोंका पान करते हों और उससे परिचय प्राप्तकर समुद्रकी कीर्ति गा रहे हों [क्योंकि समुद्र मकरोंका निवास-स्थान और चन्द्रमाका उत्पत्तिस्थान है ] ॥ ५ ॥ देखो, इनके वक्षःस्थलपर पदिक सुशोभित है, उसकी ज्योति खूब फैली हुई है। उसके चारों ओर गजमुक्ताओंकी सुविशाल माला विराजमान है, मानों नवीन श्याममेघपर सूर्यकी कला देखकर उसे कौतुकवश नक्षत्रमालाने घेर लिया हो [यहाँ शरीर श्याममेघ है, पदिक सूर्यकला है और गजमुक्तामाल नक्षत्रगण हैं। मेघपर सूर्य- कलाका दिखायी देना तथा सूर्यको नक्षत्रोंका घेरना अघटितघटनाका ही कौतुक है] ॥ ६ ॥ इस समय अपने-अपने घरोंपर खड़ी हुई पुरनारियाँ प्रभुको देखकर आनन्द पूर्ण हो उनपर बहुतसे फूल और केसर के परागकी वर्षा कर रही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय परम कल्याणधाम भगवान् राम अपनी छबिसे अरबों कामदेवों का मानमर्दन करते हैं ॥ ७ ॥