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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

गीतावली ६८ हूँ)। इसलिये वे रामका बारम्बार आलिङ्गन करने लगीं, मानों दाँव जीतनेवाला अपने जीतके द्रव्यको दोनों हाथोंसे बड़ी लालसाके साथ समेटता हो ॥४॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस चरित्रको देवता लोग बादलोंकी ओटमें खड़े होकर देख रहे हैं और [इसे निरन्तर देखते रहनेकी इच्छासे] देवता तो इन्द्र (सहस्राक्ष) होना चाहते हैं और इन्द्र सूर्य (सहस्रकर) होनेके लिये उत्सुक हैं ॥ ५ ॥ राग जैतश्री [ २९ ] भूमितल भूपके बड़े भाग। राम लखन रिपुदमन भरत सिसु निरखत अति अनुराग ॥ १ ॥ बालविभूषन लसत पायँ मृदु मंजुल अंग-बिभाग । दसरथ-सुकृत मनोहर बिरवनि रूप-करह जनु लाग ॥ २ ॥ राजमराल बिराजत बिहरत जे हर-हृदय-तड़ाग । ते नृप-अजिर जानु कर धावत धरन चटक चल काग ॥ ३ ॥ सिद्ध सिहात, सराहत मुनिगन, कहैं सुर किंनर नाग । 'ह्वै बरु बिहँग बिलोकिय बालक बसि पुर उपबन बाग' ॥ ४ ॥ परिजन सहित राय रानिन्ह कियो मज्जन प्रेम-प्रयाग । तुलसी फल ताके चारचो मनि मरकत पंकजराग ॥ ५ ॥ इस पृथ्वीतलमें राजा दशरथके बड़े भाग्य हैं, क्योंकि वे बालक राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको अनुरागपूर्ण दृष्टिसे निहारते हैं॥१॥ बालकोंके चरणोंमें तथा अतिमृदुल और सुन्दर अङ्ग-प्रत्यङ्गमें जो यथास्थान विभाजित करके बालोचित आभूषण सजाये गये हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो महाराज दशरथके मनोहर पुण्यरूपो पौधोंमें रूपका कल्ला

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