भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

गीतावली ७० हरि बिरंचि हर हेरि राम प्रेम-परबसताई। सुख-समाज रघुराजके बरनत बिसुद्ध मन सुरनि सुमन झरि लाई ॥ ५ ॥ सुमिरत श्रीरघुबरनिकी लीला लरिकाई। तुलसिदास अनुराग अवध आनँद अनुभवत तब को सो अजहुँ अघाई ॥ ६ ॥ अति सुन्दर चारों भाई मगन होकर आँगनमें खेल रहे हैं। भाई शत्रुघ्नके सहित भरतलाल, लक्ष्मण तथा राम—इन सुन्दर बालकोंको देख-देखकर सब माताएँ अति आनन्दित होती हैं ॥१॥ चारों बालक बालोचित वस्त्र और आभूषण धारण किये हुए हैं, नखसे शिखतक शोभा छायी हुई है। कामदेवकी, नील और पीत कमलकी मनोहर मालाओंने मानों इनके शरीरोंसे ही शोभा पायी है ॥ २ ॥ इनके ठुमक-ठुमककर चरण रखने, नाचने, लड़खड़ाने, दौड़ने, मिलने, रूठने, प्रसन्न होने, किलकने, देखने तथा बोलनेकी सुन्दरताका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥ राजभवनके मणि- मय आँगनरूप आलबालमें दशरथजीके पुण्य-कल्पतरुको बढ़ाता देख मानों विधाताने समस्त माताओंको सुन्दर बाड़ बनाकर उसे चारों ओरसे घेर दिया है ॥४॥ ब्रह्मा-विष्णु और महादेव भगवान् रामकी प्रेम-परवशता देख विशुद्ध मनसे रघुराज (दशरथजी) की सुखराशिका वर्णन करते हैं। देवताओंने फूलोंकी झड़ी लगा रखी है ॥ ५ ॥ उन रघुकुलश्रेष्ठ बालकोंकी बाललीलाओंका स्मरण कर तुलसीदासजी उस समयकी ही भाँति अब भी अयोध्यामें अघाकर उस अनुरागके आनन्दका अनुभव कर रहे हैं ॥ ६ ॥