गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसरनि बिकसित कंजपुंज मकरन्दबर, मंजुतर मधुर मधुकर गुंजारे। मनहुँ प्रभुजनम सुनि चैन अमरावती, इन्दिरासन्द-मन्दिर सँवारे ॥ ४ ॥ प्रेम-संमिलित बर बचन-रचना श्रकनि राम राजीव-लोचन उघारे। दास तुलसी मुदित, जननि करें आरती, सहज सुन्दर अजिर पाँव धारे ॥ ५ ॥ हे आत ! सबेरा हो गया, माता बलिहारी जाती है। प्राण- प्यारे लाल ! अब उठो। मैं तुम्हारे मुखचन्द्रपर करोड़ों कामदेवोंको निछावर करती हूँ। देखो सूत, मागध और वन्दीजन तुम्हारी विरदावली गा रहे हैं तथा द्वारपर तुम्हारे अनुज और प्रियतम साथी बालक खड़े हैं ॥ १ ॥ चन्द्रमाकी कान्तिको मन्द हुई देख चकवा-चकवीका शोक दूर हो गया तथा अरुण आकाशमें तारागण ऐसे जान पड़ते हैं, मानो सूर्यरूप बाल मृगराजने अन्धकाररूप गजराजको दलित कर उसके अत्यन्त सुन्दर मुक्ताफल बिखेर दिये हों ॥ २ ॥ सुनो, कुक्कुट, शुक, कलहंस, कोयल और मयूर तथा पक्षियोंके बच्चे कैसा सुन्दर कलरव कर रहे हैं। हे रघुवंशमणि ! वे ऐसे जान पड़ते हैं मानों मुनि- जन अपने आश्रमोंमें परिवारसहित आपका गुणगान कर रहे हों ॥ ३ ॥ सरोवरोंमें कमलसमूह विकसित हो रहे हैं; उनके श्रेष्ठ मकरन्दके लिये अति मनोहर मधुकर सुमधुर गुञ्जार कर रहे हैं, मानो प्रभुका जन्मवृत्तान्त सुन इन्द्रलोकमें उत्सव हो रहा है और श्रीलक्ष्मी- जीने अपने आनन्दभवन सजाये हैं ॥ ४ ॥ यह प्रेममिश्रित मनोहर