भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 600 में से

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पृष्ठ 104

६६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३७ वायुना ज्योतिरभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टं ४, ज्योतिषाऽपोऽभिपन्ना ग्रसिताः परा- मृष्टा ५, अद्भिर्भूमि॑रभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा ६, भूम्याऽन्नमभिपन्नं ग्रसितं परामृष्ट ७, मन्नेन प्राणोऽभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टः ८, प्राणेन मनोऽभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टं ९, मनसा वागभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा १० वाचा वेदा अभिपन्ना ग्रसिताः परामृष्टा ११, वेदैर्यज्ञोऽभिपन्नो ग्रसितः परामृष्ट १२, स्तानि ह वा एतानि द्वादशमहाभूतान्येवंविधिप्रतिष्ठितानि तेषां यज्ञ एव पराऽर्द्ध्यः ॥ ३७ ॥ कण्डिका ३७ ॥ बारह महातत्त्वों की परम्परा ॥ ( तेन ह वै एवम् विदुषा ब्राह्मणेन ब्रह्म अभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ) उस ही ऐसे [ सावित्री का अर्थ जानने वाले ] विद्वान् ब्राह्मण करके ब्रह्म [ ईश्वर ] सब प्रकार पाया गया, ग्रसा गया [ पचाया गया वा सुधार के उसका रस लिया गया ] और प्रधानता से छूआ गया है । १ । ( ब्रह्मणा आकाशम् अभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ) ब्रह्म [ परमेश्वर ] करके आकाश सब ओर से पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । २ । ( आकाशेन वायुः अभिपन्नः ग्रसितः परामृष्ट ) आकाश करके वायु [ पवन ] सब ओर से पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । ३ । ( वायुना ज्योतिः अभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ) वायु करके प्रकाश सब ओर से पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । ४ । ( ज्योतिषा अपः + आपः अभिपन्नाः ग्रसिताः परामृष्टाः ) प्रकाश करके जल सब ओर से पाया गया ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । ५ । ( अद्भिः भूमिः अभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा ) जल करके भूमि सब ओर से पायी गई, ग्रसी गई और प्रधानता से छूई गई है । ६ । ( भूम्या अन्नम् अभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ) भूमि करके अन्न सब ओर से पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । ७ । अन्नेन प्राणः अभि- पन्नः ग्रसितः परामृष्टः ) अन्न करके प्राण [ जीवन सामर्थ्य ] सब ओर से पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । ८ । ( प्राणेन मनः अभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ) प्राण करके मन [ अन्तःकरण ] सब ओर से पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है । ९ । ( मनसा वाक् अभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा ) मन करके वाणी सब ओर से पायी गई, ग्रसी गई और प्रधानता से छूई गई है । १० । ( वाचा वेदाः अभिपन्नाः ग्रसिताः परामृष्टाः ) वाणी करके वेद सब ओर से पाये ३७-( एवम् ) अनेन प्रकारेण । सावित्र्यर्थविचारेण ( ब्रह्म ) परमेश्वरः ( अभिपन्नम् ) सर्वतः प्राप्तम् ( ग्रसितम् ) भक्षितम् । पाचितम् । रसाय गृहीतम् । (परामृष्टम्) परा + मृश आमर्शने प्रणिधाने च-क्तः । प्राधान्येन स्पृष्टम् ( मनः ) मन ज्ञाने-असुन् । सङ्कल्पाविकल्पात्मकमन्तःकरणम् ( यज्ञः ) देवपूजासंगति- करणदानव्यवहारः ( महाभूतानि ) पूर्वोक्तानि महातत्त्वानि ( विधिप्रतिष्ठि- तानि ) विधानेन स्थापितानि ( तेषाम् ) भूतानां मध्ये ( पराऽर्द्ध्यः ) छन्दसि च (पा० ५ । १ । ६७) परार्द्धं-यत् । परार्द्धं प्रधानत्वमहंतीति । अतिश्रेष्ठः ॥

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य) · पृष्ठ 104, कुल 600 में से · BharatKosha