भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 600 में से

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पृष्ठ 108

७० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६ जल लेकर—तुम जीव वाले हो—इस सूक्त से [ चार मन्त्रों से ] तीन बार आचमन करता है। (सः यत् पूर्वम् आचामति सप्त तान् प्राणान् एतेन अस्मिन् आप्याययति [ताः च अपि ], याः हि शरीरात् बाह्याः एताः मात्राः, तत् यथा एतत्. अग्निं वायुम् आदित्यं चन्द्रमसम् अपः अन्यान् पशून् च प्रजाः तान् एतेन अस्मिन् आप्याययति—आपः अमृतम् ) वह जो पहिला आचमन करता है उन सात प्राणों [ शरीर में भीतर जाने वाले जीवनवर्धक श्वासों ] को इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है [ और उन मात्राओं को भी पुष्ट करता है ] जो यह शरीर से बाहर चलती हुई मात्रावें हैं, सो जैसे यह हैं--अग्नि १ [ अर्थात् शारीरिक, पार्थिव, समुद्रीय, गुप्त प्रकट बिजुली आदि अग्नि विद्या ] वायु २ [ अर्थात् पवन विद्या जैसे पवन क्या है और उसका प्रभाव सब जीवों, सब पृथिवी सूर्य आदि लोकों पर क्या है ], सूर्य ३ [ अर्थात् सूर्य विद्या, जैसे सूर्य का पृथिवी आदि लोकों और उनके पदार्थों से और उन सबका सूर्य लोक से क्या सम्बन्ध है ], चन्द्रमा ४ [ अर्थात् चन्द्र विद्या, जैसे उपग्रह चन्द्रमा अपने ग्रह पृथिवी पर किस सम्बन्ध से क्या प्रभाव करता है और अन्य चन्द्रमाओं का अन्य ग्रहों से क्या सम्बन्ध है ], जल ५ [ अर्थात् जल विद्या, जैसे जल क्या है और वह भूमण्डल, मेघमण्डल, सूर्यमण्डल आदि लोकों से क्या सम्बन्ध रखता है ], जीव वाले पशु ६ [ अर्थात् पशु विद्या, जैसे गौ घोड़ा आदि जीव पृथिवी लोक और दूसरे लोकों में कैसे उपकारी होते हैं ], और प्रजाओं ७ [ अर्थात् प्रजा की विद्या कि परमात्मा की सृष्टि में भूलोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक आदि के मनुष्य और जीवजन्तुओं का सम्बन्ध आपस में और दूसरे लोक वालों से क्या है ]--इन सबको इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है, [ क्योंकि ] जल अमृत है। (सः यत् द्वितीयम् आचा- मति सप्त तान् अपानान् एतेन अस्मिन् आप्याययति [ ताः च अपि ], याः हि शरीरात् बाह्याः एताः मात्राः, तत् यथा एतत्, पौर्णमासीम् अष्टकाम् अमावास्यां श्रद्धां दीक्षां यज्ञं दक्षिणाः. तान् एतेन अस्मिन् आप्याययति--आपः अमृतम् ) वह जो दूसरा आचमन करता है, उन सात अपानों [ शरीर से बाहर निकलने वाले ( अवसाय ) अव+षो अन्तकर्मणि-ल्यप् । निश्चित्य ( प्राचीः ) पूर्वस्मिन् काले भवाः ( शाखाः ) वेदव्याख्याः ( संधाय ) सम्+दधातेः---ल्यप् । संयुज्य । ( अमृतम् ) नास्ति मृतं मरणं यस्मात् तत् । जलम् ( उपस्तरणम् ) उप + स्तृञ् विस्तारे आच्छादने च--ल्युट् । बहुविस्तारकम् ( अमृताय ) अमरणाय । ( उपस्तृणामि ) अधिकं विस्तारयामि । आचामामि । ( एतेन ) अनेन विधिना ( अस्मिन् ) दृश्यमाने शरीरे ( एताः ) एतेस्तुट् च ( उ० १ । १३३ ) इण् गतौ-- अदिः प्रत्ययः, तस्य च तुडागमः । गमनशीलाः (अग्निम्) अग्निविद्याप्रकाशम् (वायुम्) पवनविद्याम् ( आदित्यम् ) आदीद्यमानसूर्यविद्याम् ( चन्द्रमसम् ) आह्ला- दकचन्द्रविद्याम् ( अपः ) व्यापकजलविद्याम् ( पशून् ) गवाश्वादिजीवान् । ( अन्यान् ) माछाणसिभ्यो यः ( उ० ४ । १०९ ) अन प्राणने--षप्रत्ययः । प्राणिन. । ( आप्याययति ) आ+प्यैङ् वृद्धौ-णिच् । समन्तात् वर्धयति । पोषयति (अपानान्)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य) · पृष्ठ 108, कुल 600 में से · BharatKosha