भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 600 में से

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१०४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १४ ॥ कण्डिका १४ ॥ काबन्धि का देवयजनों के विषय में वर्णन ॥ (अथ अतः देवयजनानि आत्मा देवयजनं श्रद्धा देवयजनम् ऋत्विजः देवयजनं भौमं देवयजनम्) अब यहाँ से देवयजन [विद्वानों के पूजा स्थान] कहे जाते हैं—[देखो कण्डिका ११]—आत्मा देवयजन है, श्रद्धा [पूरा विश्वास] देवयजन है, ऋत्विज् [सब ऋतुओं में यज्ञ कराने वाले] देवयजन हैं, जल [जो भूमि से भाप होकर फिर मेह बनकर बरसता है] देवयजन है। (तत् वै एतत् आत्मा देवयजनं यत् उपव्यायच्छमानः वा अनुपव्यायच्छमानः वा शरीरम् अधिवसंति, एषः यज्ञः एषः यजतः, एतं यजन्ते, एतत् देवयजनम्) सो ही यह आत्मा देवयजन है जो [आत्मा] फैलता हुआ अथवा न फैलता हुआ [बड़ा वा छोटा होकर] शरीर में बसता है, यह यज्ञ है, यह यजमान है, इसको पूजते हैं. यह देवयजन है। (अथ एतत् श्रद्धा देवयजनं यद्वा एव कदाचित् आदद्यात् श्रद्धा तु एव एनं न अतीयात्, तत् देवयजनम्) फिर यह श्रद्धा देवयजन है, जब कभी भी वह [ब्रह्मचारी] लेवे श्रद्धा तो इस [लेने वाले] को न उल्लंघन करे, यह देवयजन है। (अथ एतत् ऋत्विजः देवयजन यत्र क्वचित् विद्यावान् ब्राह्मणः मन्त्रेण करोति तत् देवयजनम्) फिर यह ऋत्विज् लोग देवयजन हैं, जहाँ कहीं विद्वान् ब्राह्मण मन्त्र से कर्म करता है वह देवयजन है। (अथ एतत् भौमं देवयजनं यत्र आपः तिष्ठन्ति यत्र स्यन्दन्ति तत् प्रवहन्ति उद्द्वहन्ति, तत् देवयज- नम्) फिर यह भौम [भूमि से निकला हुआ जल] देवयजन है, जहाँ जल ठहरता है. जहां चूता है, वहाँ बहता है और चढ़ता है, वह देवयजन है, (यत् समं समूलम् अविदग्धं प्रतिष्ठितं प्रागुदक्प्रवणं समं समास्तीर्णम् इव भवति) जो [स्थान] चौरस नींव वाला, बिना जला हुआ, प्रतिष्ठा वाला, पूर्व और उत्तर की ओर झुका हुआ, चौरस और एकसा फैला हुआ होवे (यस्य पुरस्तात् श्वभ्र ऊर्मः वृक्षः पर्वतः नदी पन्थाः वा स्यात्) जिसके आगे चलते हुए पवन वाले हवादार वृक्ष, पहाड़, नदी, अथवा मार्ग हो, (देवयजनमात्रम् पुरस्तात् न पर्यवशिष्येत्) देवयजन का परिमाण सामने को न बचा रहे, (न अग्नेः उत्तरतः पर्युपासीरन् इति ब्राह्मणम्) और न अग्नि के उत्तर की ओर बैठें—यह ब्राह्मण है ॥ १४ ॥ १४—(श्रद्धा) पूर्णविश्वासः (ऋत्विजः) सर्वेषु ऋतुषु यज्ञकर्तारः। (भौमम्) भूमि—अण्। वाष्पमेघरूपेण भूमेर्जातं जलम् (उपव्यायच्छमानः) उप+वि+आ+यम उपरमे—शानच्। दीर्घीभवन् (अनुपव्यायच्छमानः) अदीर्घी- भवन्। अल्पीभवन् (यजतः) भृमृदृशियजि० (उ० ३।११०) यज देवपूजासंगति- करणदानेषु-अतच्। यजमानः (यजन्ते) पूजयन्ति (आदद्यात्) गृह्णीयात् (अतीयात्) अति+इण् गतौ—विधिलिङ्। उल्लंघयेत् (आपः) जलानि (तत्) तत्र (प्रवहन्ति) प्रकर्षेण गच्छन्ति (श्वभ्रः) श्वभ्र गतौ—घञ्। गमनशीलः। (ऊर्मः) अर्तेरुच्च (उ० ४।४४) ऋ गतौ-मिः, उत्, ततः अर्शआद्यच्। ऋच्छति गच्छतीति ऊर्मः वेगः। (मात्राम्) परिमाणम् (पर्यवशिष्येत्) परि+अव+शिष असर्वोपयोगे—विधि-

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