गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १२ ॥ १५७ वाला विकङ्कत काष्ठ का बना हुआ भुजा तुल्य चमचा ] को तीन बार मैंने उठाया है, रुद्रों [ शत्रुनाशक शूरवीरों ] को मैंने तृप्त किया है २६, ( यत् बर्हिषि स्रुचं निधाय उन्मृज्य उत्तरतः पाणी निरमार्शं तेन ओषधिवनस्पतीन् अप्रैषम् ३० ) जो कुशासन पर स्रुचा को धर के उत्तर की ओर दोनों हाथों को मैंने धोया है, उससे ओषधि वनस्पतियों को मैंने तृप्त किया है ३०, ( यत् द्वितीयम् उन्मृज्य पित्र्यु- पवीतं कृत्वा दक्षिणतः पितृभ्यः स्वधाम् अकार्षम् तेन पितॄन् अप्रैषम् ३१ ) जो दूसरी [ स्रुचा ] को धोकर पित्र्य [ पितृतीर्थ अर्थात् तर्जनी और अंगूठे के बीच ] में यज्ञोपवीत करके दक्षिण ओर में पितरों [ बड़े बूढ़े विद्वानों ] के लिये स्वधा [ अन्न ] मैंने किया है, उस से पितरों [ बड़े बूढ़े विद्वानों ] को मैंने तृप्त किया है ३१. ( यत् प्रथमं प्राशिषं तेन प्राणान् अप्रैषम् ३२ ), जो पहिली [ हवि ] को मैंने खाया है, उस से प्राणों को मैंने तृप्त किया है ३२, ( यत् द्वितीयं तेन गर्भान्, तस्मात् अनश्नन्तः गर्भाः जीवन्ति, ३३ ) जो दूसरी [ हवि ] को [ मैंने खाया है ] उससे गर्भो को [ मैंने तृप्त किया है ] इस कारण बिना खाते हुये [ अर्थात् नाभि की नाड़ी से रस खींचते हुये ] गर्भ जीते हैं ३३, ( यत् अन्ततः सर्वम् एव आप्राशिषं तेन विश्वान् देवान् अप्रैषम् ३४) जो अन्त में सब ही [हवि] को मैंने खा लिया है उस से सब दिव्य गुणों को मैंने तृप्त किया है ३४, ( यत् उदकम् अप्रक्षालितया स्रुचा न्यनैषं तेन सर्पेतर्जनान् अप्रैषम् ३५ ) जो जल को बिना धुली स्रुचा से मैंने गिराया है, उससे गतिशील से भिन्न पामरजनों को मैंने तृप्त किया है ३५, ( यत् प्रक्षालितया तेन सर्पपुण्यजनान् ३६ ) जो धुली हुई [ स्रुचा ] से [ मैंने जल गिराया है ], उससे गतिशील पवित्र आचरण वाले लोगों को [ मैंने तृप्त किया है ] ३६, ( यत् अपरेण स्रुचा उदकम् आहवनीयं न्यनैषं तेन गन्धर्वाप्सरसः अप्रैषम् ३७ ) जो दूसरी स्रुचा से जल को आहवनीय अग्नि पर मैंने गिराया है, उससे गन्धर्व अप्सरसों [ पृथिवी के धारण करने वालों और आकाश में चलने वालों ] को मैंने तृप्त किया है ३७, ( यत् स्रुवं स्रुचं च प्रत्यताप्तं तेन सप्तऋषीन् अप्रैषम् ३८ ) जो स्रुवा [ खैर की लकड़ी का बना हुआ हाथ भर का यज्ञपात्र ] और स्रुचा को मैंने तपाया है, उससे सात ऋषियों [ त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि ] को मैंने तृप्त किया है ३८, शत्रुरोधकान् ( अप्रैषम् ) प्रीञ् तर्पणे—लुङ् । तर्पितवानस्मि ( प्राशिषम् ) प्रक- र्षेण भक्षितवानस्मि ( अनश्नन्तः ) न भक्षयन्तः ( सर्पेतर्जनान् ) सर्पन्ति गच्छन्ति सर्पाः गतिशीलाः । इतरः भिन्नः जनः पामरलोकः । गतिशीलेभ्यो भिन्नान् पामरजनान् ( सर्पपुण्यजनान् ) गतिशीलान् पवित्राचरणान् ( गन्धर्वाप्सरसः ) गां वाणीं पृथिवीं गतिं वा धरति धारयति वा स गन्धर्वः । कृगृपृदुभ्यो वः ( उ० १ । १५५ ) गो+धृञ् धारणे—वप्रत्ययः, गो शब्दस्य गम् । सर्त्तेरपूर्वादसिः ( उ० ४ । २३७ ) अप् + सृ गतौ—असिः । अप्सरसः अप्सु आकाशे सरणशीलाः । पृथिवीधारकान् आकाशे गमनशीलान् च ( सप्तऋषीन् ) इगुपधात् कित् ( उ० ४ । १२० ) ऋषी गतौ दर्शने च—इन् । ऋत्यकः ( पा० ६ । १ । १२५ ) इति प्रकृतिभावः । सप्त ऋषयः प्रतिष्ठिताः शरीरे—यजु० ३४ । ५५ । त्वक्चक्षुःश्रवण-