गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० २१ मनन, निदिध्यासन=तीन कर्म, अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त की रक्षा, रक्षित का बढ़ाना, बढ़े हुये का अच्छे मार्ग में—व्यय करना, और सोलहवां मोक्ष का अनुष्ठान—जैसा दयानन्द भाष्य यजुर्वेद ६।३४ में व्याख्यात है]। (तया रूढ्वा स्वर्गं लोकम् अध्यारोहन्ति) उस [इष्टि] के द्वारा चढ़कर स्वर्ग लोक में चढ़ते हैं॥२०॥ भावार्थ:—सूर्यमण्डल प्रकाशपिण्ड है, उसके दोनों ओर आगे पीछे प्रकाश है, इसी प्रकार यज्ञ के दोनों ओर आदि अन्त में अभिप्लव अथवा पृष्ठ्य यज्ञ होता है॥२०॥ कण्डिका २१॥ अथातोऽह्नामध्यारोहः। प्रायणीयेनातिरात्रेणोदयनीयमतिरात्रमध्यारोहन्ति, चतुर्विशेन महाव्रतमभिप्लवेन परमभिप्लवं, पृष्ठ्येन परं पृष्ठ्यमभिजिता ऽभिजितं, स्वरसामभिः परान् स्वरसामानोऽथ हैतदहरवाप्नुयामेति यद्वैषुवतम्परेषां स्विदित- मह्नां परेषा मित्यपरेषां च परेषां चेति ब्रूयात्स वा एष संवत्सरः ॥२१॥ कण्डिका २१॥ संवत्सर का अतिरात्र आदिकों से संबन्ध (अथ अतः अह्नाम् अध्यारोहः) अब यहाँ दिनों [यज्ञ विशेषों] का चढ़ाव [कहा जाता है]। (प्रायणीयेन अतिरात्रेण उदयनीयम् अतिरात्रम् अध्यारोहन्ति) प्रायणीय अतिरात्र [यज्ञ] से उदयनीय अतिरात्र को चढ़ते हैं, (चतुर्विशेन महाव्रतम्) चतुर्विंश से महाव्रत को, (अभिप्लवेन परम् अभिप्लवम्) अभिप्लव से पिछले अभिप्लव को, (पृष्ठ्येन परं पृष्ठ्यम्) पृष्ठ्य से पिछले पृष्ठ्य को, (अभिजिता अभिजितम्) अभिजित् से अभिजित् को (स्वरसामभिः परान् स्वरसामानः) स्वरसामों से पिछले स्वरसामों को [चढ़ते हैं]। (अथ ह एतत् अहः अवाप्नुयाम यत् वैषुवतम् इति) अब हम ही वह दिन प्राप्त करें जो विषुवान् वाला [दिन] है, (अपरेषाम् अह्नां स्विदितं परेषा म् इति, परेषां च अपरेषां च इति ब्रूयात्) [विषुवान् से] इधर वाले दिनों का पसीना [निचोड़] है जो उधर वालों का है, और [विषुवान् से] उधर वाले [दिनों] का [पसीना] है, वह इधर वालों का है—ऐसा कहना चाहिये। (सः वै एषः संवत्सरः) वही यह संवत्सर है [देखो क० १६]॥२१॥ भावार्थ:—दोनों विषुवानों में से किसी ही विषुवान् से संवत्सर यज्ञ आरम्भ करना चाहिये। यह विषुवान् से एक ओर वाले यज्ञों का वर्णन है॥२१॥ युक्तम्। चत्वारो वर्णाश्चत्वारः आश्रमाः, श्रवणमनननिदिध्यासनानि त्रीणि कर्माणि, अलब्धस्य लिप्सा, लब्धस्य यत्नेन रक्षणं, रक्षितस्य वृद्धिः, वृद्धस्य सन्मार्गे व्ययीकरणम् एष चतुर्विधः पुरुषार्थः, एतैः पंचदशभिः प्राप्तः षोडशो मोक्षः—यथा व्याख्यातं दयानन्दभाष्ये यजुर्वेदे। ९।३४। एतैः षोडशभिर्युक्तम् (रूढ्वा) अधिरुह्य॥ २१—(अध्यारोहः) आरोहणम् (अध्यारोहन्ति) उपरिगच्छन्ति (परम्) पश्चाद्भवम् (स्वरसामानः) स्वरसाम्नः। यज्ञविशेषान्। अन्यद्गतम्—क० १९॥