भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 600 में से

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पृष्ठ 276

२३८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० १४ ॥ अन्तरिक्षे लोके वायुं सन्तं अनु आरभते ३) वह जो कहता है—तू तीनों ताप रोकने में समर्थ [ परमात्मा ] है, तुझ को निरन्तर मैं ग्रहण करता हूं—तीनों ताप रोकने वाले सामर्थ्य से रुद्र देवों [ पापियों को रुलाने वाले वा ज्ञान देने वाले विद्वानों ] के साथ माध्य- न्दिन सवन पर अन्तरिक्ष लोक में वायु [ अन्तर्यामी वा महाबली परमात्मा ] होते हुये को निरन्तर ग्रहण करता है। ३। (सः यत् आह स्वस्ति मा संगारय इति त्रैष्टुभेन एव छन्दसा रुद्रैः देवैः माध्यन्दिने सवने अन्तरिक्षलोके वायुना देवेन स्वस्ति मा संपारय इति ४) वह जो कहता है-कल्याण के साथ मुझ को तू यथावत् पार लगा-तीनों ताप रोकने वाले ही सामर्थ्य से रुद्र देवों [ पापियों के रुलाने वाले वा ज्ञान देने वाले विद्वानों ] के साथ माध्यन्दिन सवन पर अन्तरिक्ष लोक में वायु देव [ अन्तर्यामी वा महा- बली परमात्मा ] के साथ कल्याण से अपने को यथावत् पार करता है। ४। (तत् एनं त्रैष्टुभेन एव छन्दसा रुद्रैः देवैः माध्यन्दिने सवने अन्तरिक्षलोके वायुना देवेन स्वस्ति संपद्यते यः एवं वेद ५) सो उस पुरुष को तीनों ताप रोकने वाले ही सामर्थ्य से रुद्र देवों [ पापियों के रुलाने वाले वा ज्ञान देने वाले ] विद्वानों के साथ माध्यन्दिन सवन पर अन्तरिक्ष लोक में वायु देव अन्तर्यामी [ वा महाबली परमात्मा ] के साथ कल्याण को वह प्राप्त करता है, जो ऐसा जानता है। ५ ॥ १३ ॥ भावार्थः—कण्डिका १२ के समान है ॥ विशेषः—सम्राडसि······, यह अथर्ववेद ६ । ४८ । ३ । के तीन पाद कुछ भेद से हैं ॥ कण्डिका १४ ॥ अथार्भवे पवमाने वाचयति स्वरोऽसि गयोऽसि जगच्छन्दा अनु त्वांरभे स्वस्ति मा सम्पारयेति । १ । स यदाह स्वरोऽसीति सोमं वा एतदाहैष ह वै सूर्य्यो भूत्वा- ऽमुष्मिन् लोके स्वरति तद्यत् स्वरति तस्मात् स्वरस्तत् स्वरस्य स्वरत्वम् । २ । स यदाह गयोऽसीति सोमं वा एतदाहैष ह वै चन्द्रमाः भूत्वा सर्व्वाँ ल्लोकान् गच्छति तद् यद् गच्छति तस्म द् गयस्तद् गयस्य गयत्वं । ३ । स यदाह जगच्छन्दा अनु त्वारभ इति जागतेन छन्दसाऽऽदित्यैर्देवैस्तृतीयसवनेऽमुष्मिन् लोके सूर्य्यं सन्त- मन्वारभते । ४ । स यदाह स्वस्ति मा सम्पारयेति जागतेनैव च्छन्दसाऽऽदित्यैर्देवै- स्तृतीयसवनेऽमुष्मिन् लोके सूर्य्येण देवेन स्वस्तिमा सम्पारयेति । ५ । जागतेनैवै- नन्तच्छन्दसाऽऽदित्यैर्देवैस्तृतीयासवनेऽमुष्मिंल्लोके सूर्य्येण देवेन स्वस्ति सम्पद्यते य एवं वेद ॥ १४ ॥ कण्डिका १४ ॥ तृतीय सवन की स्तुति का मन्त्र सोमविषय में ॥ (अथ आर्त्तवे पवमाने वाचयति, जगच्छन्दाः स्वरः असि गयः असि त्वा अनु आरभे स्वस्ति मा संंपारय इति १) फिर ऋभुओं [ मेधावियों ] के पवमान यज्ञ में वह (सम्राजः) राजराजेश्वरस्य (सम्राट्त्वम्) साम्राज्यम् (त्रैष्टुभेन) त्रिष्टुभ्—अण् । तापत्रयनिरोधसंबन्धिनः (छन्दसा) स्वातन्त्र्येण । सामर्थ्येन (मा सम्पारय) आत्मानं सम्पारयति ॥

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