गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२५८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५। क० १५ ॥ [ आत्मा संबन्धी ज्ञान ] वाणी और यजुर्मन्त्रों का [ अध्यात्म ] प्राण कहा गया है, सामवेद का [ अध्यात्म ] दो आंखें, ओर भृगु अङ्गिराओं [ परिपक्व ज्ञान वाले अथर्ववेद मन्त्रों ] का मन [ अध्यात्म ] कहा गया है । ६ । ( ऋग्भिः सह गायत्रं जागतम् आहुः, यजूंषि त्रैष्टुभेन सह जज्ञिरे, उष्णिक्ककुब्भ्यां भृग्वङ्गिरसः, जगत्या सामानि कवयः वदन्ति १०) ऋग्वेद मन्त्रों के सहित गाने योग्य जगत् उपकारक कर्म को वे कहते हैं, यजुर्मन्त्र त्रैष्टुभ [ तीन कर्म उपासना ज्ञान के धारण सामर्थ्य ] के सहित उत्पन्न हुये, दो उष्णिक् [ अति प्रीति ] और ककुभ् [ सुख धारण करने वाले शस्त्रों ] के सहित भृगु अङ्गिराओं [ परिपक्व ज्ञान वाले अथर्ववेद मन्त्रों ] को और जगती [ जगत् उपकारक विद्या ] के सहित साम मन्त्रों [ मोक्षज्ञानों ] को बुद्धिमान् कहते हैं। १०। (ऋग्भिः पृथिवीं यजुषा अन्तरिक्षं साम्ना दिवम्, अथर्वभिः अङ्गिरोभिः च गुप्तः चतुष्पात् लोकजित् सोमजम्भाः यज्ञः दिवम् उद्वहेत ११) ऋग्मन्त्रों से पृथिवी [ विद्या ] को, यजुर्वेद से अन्तरिक्ष [ मध्यलोक विद्या ] को, और सामवेद से सूर्यं [ विद्या ] को [ मनुष्य पावे ], और अथर्व अङ्गिराओं [ निश्चल ब्रह्म के अथर्ववेद मन्त्रों ] से रक्षा किया गया, चतुष्पाद [ चारों वेदों से चार पांव वाला ], संसार को जीतने वाला, सोम [ अमृत ] का भोग कराने वाला यज्ञ स्वर्ग को चढ़ावे । ११ । ( ऋग्भिः सुशस्तः यजुषा परिष्कृतः सामजित् सविष्टुतः, अथर्वभिः अङ्गिरोभिः च गुप्तः चतुष्पात् सोमजम्भाः यज्ञः दिवम् आरुरोह १२) ऋग्वेद मन्त्रों से भले प्रकार प्रशंसा किया हुआ, यजुर्वेद से प्रस्तुत किया हुआ और मोक्ष प्राप्त कराने वाले [ सामवेद ] से विविध स्तुति वाला [ यज्ञ होवे ], और अथर्व अङ्गिराओं [ निश्चल ब्रह्म के अथर्ववेदमन्त्रों ] से रक्षा किया गया, चतुष्पाद [ चारों वेदों से चार पांव वाला ], सोम [ अमृत ] का भोग कराने वाला यज्ञ स्वर्ग को चढ़ावे । १२ । ( ऋचः विद्वान् सम्प्रति पृथिवीं, यजूंषि विद्वान् बृहत् अन्तरिक्षं वेद, सामगः यः विपश्चित् दिवं वेद, यत् भृग्वङ्गिरोवित् सर्वान् लोकान् १३) ऋग्मन्त्रों को जानने वाला ठीक प्रत्यक्ष पृथिवी को, यजुर्वेद मन्त्रों को जानने वाला बड़े अन्तरिक्ष [ मध्यलोक ] को जानता है, साम गाने वाला जो विद्वान् है वह सूर्यलोक को जानता है, और जो भृगु अङ्गिराओं [ परिपक्व ज्ञानवाले चारों वेदों ] का जानने वाला है वह सब लोकों को [ जानता ] है । १३ । ( यान् च नानार्थान् मन्त्रान् ग्रामे यान् च अरण्ये जनासः बहुधा जपन्ति, ते सर्वे यज्ञाः अङ्गिरसो अपि यन्ति, ब्रह्मणः सा हि गतिः नूतना या अवराध्या १४ ) और जिन अनेक अर्थ वाले मन्त्रों को ग्राम में और जिनको वन में लोग प्रायः जपते हैं, वे सब यज्ञ अङ्गिराओं [ वेदज्ञानियों ] को प्राप्त होते हैं, ब्रह्म धारणे च सौत्रधातुः-क्विप् । अतिप्रीतिसुखधारणशस्त्राभ्याम् (जगत्या ) जगदुपकारकक्रियया ( कवयः ) मेधाविनः (सोमजम्भाः) क० २४। सोमभक्षणकारकः (दिवम्) स्वर्गम् । सूर्यम् (उद्वहेत ) प्रापयेत ( सुशस्त ) सुप्रशंसितः. (आरुरोह) आरोहयत् (विद्वान् ) विद्वन् । जानन् (सम्प्रति ) सम्यक् प्रत्यक्षम् (ब्रह्मणः) ब्रह्मज्ञानस्य (अवराध्या) अवर + अर्ध-यत् ।