गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २ ॥ २६५ उसने इस मन्त्र को देखा [ विचारा ] और कहा—( सूर्यस्य............प्रतीक्षे ) सूर्य [ सर्वप्रेरक परमात्मा ] के [ दिये ] चक्षु [ दर्शन सामर्थ्य ] से तुझको देखता हूं [ यह ब्राह्मण वचन है ] । ( सूर्यस्य चक्षुः किञ्चन नहि हिनस्ति ) सूर्य [ परमात्मा ] के दर्शन सामर्थ्य को कोई भी नहीं नष्ट करता है । ( सः अबिभेत्, प्रतिगृह्णन्तं मा हिंसिष्यति इति ) वह डरा—ग्रहण करते हुये मुझको यह नष्ट कर देगा । ( त्वा देवस्य सवितुः प्रसवे अश्विनोः बाहुभ्यां पूष्णः हस्ताभ्यां प्रशिषा प्रसूतः प्रतिगृह्णामि इति अब्रवीत् ) तुझको प्रकाशमान सविता [ सर्वोत्पादक परमेश्वर ] के बड़े ऐश्वर्य के बीच, दोनों अश्विनों [ सब विद्याओं में व्याप्त माता पिता ] के दोनों भुजाओं से और पूषा [ पोषक आचार्य ] के दोनों हाथों और शिक्षा से प्रेरणा किया हुआ मैं ग्रहण करता हूं—यह [ यह मन्त्र कुछ भेद से अथर्व० १६ । ५१ । २ । और यजु० २ । ११ का है । ] वह बोला । ( सवितृप्रसूतः एव एनं तत् देवताभिः प्रत्यगृह्णात् ) सविता [ परमात्मा ] से प्रेरणा किये हुये उसने ही इस [ प्राशित्र ] को देवताओं के सहित ग्रहण किया । ( तत् प्राक् तृणानि व्यूह्य स्थण्डिले दण्डं निदधाति, त्वा पृथिव्याः नाभौ सादयामि इति ) तब पहिले तृणों को ठीक करके चौरस स्थान पर दण्डे को वह गाड़ता है—तुझको पृथिवी की नाभि में मैं स्थापित करता हूं [ यजुर्वेद १ । ११ का भाग है ] । ( पृथिवी वा अन्नानां शमयित्री, तया एव एतत् शमयांचकार ) और पृथिवी [ सब का विस्तार करने वाला परमात्मा ] ही अन्नों का शमन करने वाला है, उसके ही द्वारा इसको उसने शान्त किया । ( सः अबिभेत् प्राश्नन्तं मा हिंसिष्यति इति ) वह डरा—मुझ खाते हुये को यह मार डालेगा । ( त्वा अग्नेः आस्येन प्राश्नामि इति अब्रवीत् ) तुझको अग्नि [ सर्व प्रकाशक परमेश्वर ] के [ दिये हुये ] मुख से मैं खाता हूं—[ यह मन्त्र यजु० २ । ११ का अन्तिम पाद ] वह बोला । ( अग्नेः आस्यं किंचन नहि हिनस्ति ) अग्नि [ परमात्मा ] के [ दिये हुये ] मुख को कोई नहीं नष्ट करता है । ( सः अबिभेत् प्राशितं मा हिंसिष्यति इति ) वह डरा—खाया हुआ [ प्राशित्र ] मुझे मार डालेगा । ( त्वा इन्द्रस्य जठरे सादयामि इति अब्रवीत् ) तुझको इन्द्र के [ परम ऐश्वर्यवान् परमेश्वर के दिये हुये ] जठर [ कोख ] में रखता हूं—यह [ ब्राह्मण वचन ] वह बोला । ( प्रतीक्षे ) प्रत्यक्षं पश्यामि ( हिनस्ति ) नाशयति (देवस्य) प्रकाशमानस्य (सवितुः) सर्वोत्पादकस्य । परमेश्वरस्य ( प्रसवे ) प्रकृष्टैश्वर्ये (अश्विनोः) सकलविद्याव्याप- योर्मातापित्रोः (बाहुभ्याम्) भुजयोः सकाशात् ( पूष्णः ) पोषकस्य । आचार्य्यस्य ( हस्ताभ्याम् ) करयोः सकाशात् ( प्रसूतः ) प्रेरितः ( प्रशिषा ) शासु अनुशिष्टौ- क्विप् । प्रकृष्टशासनेन ( प्रतिगृह्णामि ) स्वीकरोमि ( व्यूह्य ) विविधं समूह्य ( प्राक् ) प्रथमम् ( स्थण्डिले ) मिथिलादयश्च ( उ० १ । ५७ ) ष्ठल स्थाने--इलच्, नुक्, लस्य डः । यथार्थं समीकृते प्रदेशे (पृथिव्याः) भूमेः (नाभौ) नहो भश्च (उ० ४ । १९६ ) णह बन्धने—इन्, हस्य भः । मध्यस्थाने ( सादयामि ) स्थापयामि ( पृथिवी ) प्रथः षिवन्षवन्ष्वन्तः सम्प्रसारणं च ( उ० १ । १५० ) . प्रथ प्रख्याते विस्तारे . च—षिवन् । ङीष् । सर्वविस्तारकः परमेश्वरः ( अग्नेः ) भौतिकस्य पाचकस्य