भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 314

२७६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० ६ ॥ सोमेन यजन्ते तेषाम् एतानि ज्योतींषि पतन्ति इव यानि अमूनि नक्षत्राणि ) जो लोग ही अमावस्या और पूर्णमासी के साथ यज्ञ न करके सोम के साथ यज्ञ करते हैं, उनके यह तेज गिरते से हैं जो वे नक्षत्र हैं । ( तत् यथा आह वै इदम् असि, अष्टावसानेन इह अव॑सास्यसि, न इह अवमास्यसि इति ) सो जैसा यह कहता है—यही तू सत्ता वाला है, तू आठ [ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन आठ योगाङ्गों—योग दर्शन २ । २६ ] से समाप्त होने वाले विधान के साथ यहाँ [ यज्ञ को ] तू समाप्त करेगा, तू यहाँ नहीं समाप्त होगा । ( एते ह एव एवम् अमुष्मान् लोकान् नो अनुद्यन्ते, नो अनुद्यन्ते ते एते प्रच्यवन्ते) यह ही लोग इस प्रकार उन लोकों को नहीं नष्ट करते हैं, नहीं नष्ट करते हैं, वे ही यह लोग आगे को चलते हैं ॥ ८ ॥ भावार्थः—जैसे दर्शपूर्णमासी से यज्ञ प्रारम्भ होकर दर्शपूर्णमासी पर समाप्त होने से सिद्ध होते हैं, वैसे ही दूसरे कार्य नियत समय पर आरम्भ होने और समाप्त होने से सिद्ध होते और यश देते हैं ॥ ८ ॥ कण्डिका ९ ॥ यस्य हविर्निरुप्तं पुरस्ताच्चन्द्रमा अभ्युदियात्तांस्त्रेधा तण्डुलान्विभजेद्ये मध्यमास्तानग्नये दात्रेऽष्टाकपालान्निर्वपेत् ये स्थविष्ठास्तानिन्द्राय प्रदात्रे दधति चरुं ये क्षोदिष्ठास्तान्विष्णवे शिपिविष्टाय शृते चरुम्पशवो वा एतेऽतिरिच्यन्ते तानेवाप्नोति तानवरुन्धेऽग्निर्वे मध्यमस्य दाता इन्द्रो वै ज्येष्ठस्य प्रदाता यदेवेदं क्षुद्रं पशूनां तद्विष्णोः शिपि॑विष्टं तदेवाप्नोति पशूनेवावरुन्धे ॥ ९ ॥ कण्डिका ९ ॥ चन्द्रमा के उदय होने के पीछे हवि देने का विधान ॥ ( यस्य हविः निरुप्तं पुरस्तात् चन्द्रमाः अभ्यु॑दियात् ) जिस [ यजमान ] का हवि दिया गया होवे, [ उससे ] पहिले चन्द्रमा उदय होवे । ( तान् तण्डुलान् त्रेधा विभजेत् ) उन चावलों [ चरु ] को तीन प्रकार बाँटे । ( ये मध्यमः तान् अष्टाक- पालान् दात्रे अग्नये निर्वपेत् ) जो बीच वाले [ चावल ] हैं, उन आठ पात्रों में रखे हुओं को दान करने वाले अग्नि के लिये देवे । ( ये स्थविष्ठाः तान् चरुं प्रदात्रे इन्द्राय (अवसानदर्शौ) समाप्तिदर्शको ( असि ) वर्तमानोऽसि ( अष्टावसानेन ) यमनिय- माद्यष्टयोगाङ्गैः अवसानं समाप्तिर्यस्य तेन यज्ञेन ( अवसास्यसि ) षो अन्त- कर्मणि—लृट् । यज्ञं समाप्स्यसि ( अवसास्यसि ) समाप्तो भविष्यसि ( नो ) निषेधे ( अनुद्यन्ते ) दो अवखण्डने—लट्, आत्मनेपदत्वम् । अनुदयन्ति । विनाशयन्ति ( अमुष्मान् ) अमून् ( प्रच्यवन्ते ) प्रकर्षेण गच्छन्ति—निघ० २ । १४ ॥ ९ ( निरुप्तम् ) प्रदत्तम् ( अभ्युदियात् ) सर्वत उद्गच्छेत् ( विभजेत् ) विभक्तान् कुर्यात् ( अष्टाकपालान् ) अष्टसु कपालेषु पात्रेषु संस्कृतान् ( निर्वपेत् ) विभागेन प्रदद्यात् ( स्थविष्ठाः ) स्थूल—इष्ठन् । अतिशयस्थूलाः ( दधति ) लेटि