गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे. प्र० १ । क० २१ ॥ २९१ तृप्त करता है। ५। (अथ यत् स्वतवसः मरुतः यजति, घोराः वै स्वतवसः मरुतः तान् एव तेन प्रीणाति) फिर जब आत्मवलधारी मरुतों [दोषनाशक पवनों वा दुष्टनाशक वीरों] के लिये वह यज्ञ करता है, भयानक ही आत्मवलधारी मरुत् देवता हैं, उनको ही उससे वह तृप्त करता है। ६। (अथ यत् विश्वान् देवान् यजति, एते वै विश्वे देवाः, यत् सर्वे देवाः तान् एव तेन प्रीणाति) फिर जब विश्वदेवों के लिये वह यज्ञ करता है, यह ही विश्व देव हैं जो सब दिव्य पदार्थ हैं; उनको ही वह तृप्त करता है। ७। (अथ यत् द्यावापृथिव्यौ यजति, प्रतिष्ठे वै द्यावापृथिव्यौ, प्रतिष्ठित्थै एव) फिर जब दोनों द्यावापृथिवी [प्रकाशमान और अप्रकाशमान लोकों] के लिये यज्ञ करता है, प्रतिष्ठा [गौरव रूप] ही द्यावापृथिवी है, प्रतिष्ठा के लिये ही [उन दोनों को] उससे वह तृप्त करता है। ८। (अथ यत् वाजिनः यजति, पशवः वै वाजिनः, पशून् एव तेन प्रीणाति) फिर जब वाजियों [अन्न वालों वा बाल वालों] के लिये यज्ञ करता है, पशु ही अन्न वाले वा बल वाले हैं, पशुओं को ही उससे वह तृप्त करता है। ६। (अथो ऋतवः वै वाजिनः ऋतून एव तेन प्रीणाति) फिर ऋतुयें ही अन्न वाले वा बल वाले हैं, ऋतुओं को ही उससे वह तृप्त करता है। १०। (अथो छन्दांसि वै वाजिनः, छन्दांसि एव तेन प्रीणाति) फिर छन्द [वेद मन्त्र] ही अन्न वाले वा बल वाले हैं, वेद मन्त्रों को ही उससे वह तृप्त करता है। ११। (अथो देवाश्वाः वै वाजिनः, अन्न साश्वाः देवाः अभीष्टाः प्रीताः भवन्ति) फिर देव [विजय चाहते वाले वीर] और घोड़े ही अन्न वाले वा बल वाले हैं, यहां घोड़ों सहित देव [विजय चाहने वाले पुरुष] बड़े चाहने योग्य और प्रिय हैं। ११। (अथ यत् परस्तात् पौर्णमासेन यजते, तथा ह अस्य पूर्वपक्षे वैश्वदेवेन इष्टं भवति) फिर जब पीछे से पौर्णमास यज्ञ के साथ वह यज्ञ करता है, उसी प्रकार ही उसका पहिले पखवाड़े में वैश्वदेव [सब देवताओं के लिये यज्ञ] से यज्ञ होता है। १३। १४॥ २० ॥ भावार्थ:—यज्ञ में देवताओं को आहुति देकर उनके गुणों को यथावत् जानना चाहिए॥ २०॥ कण्डिका २१ ॥ वैश्वदेवेन वै प्रजापतिः प्रजा असृजत, ताः सृष्टा अप्रसूता वरुणस्य यवान् जक्षुः । ताः वरुणो वरुणपाशैः प्रत्यवध्नात्, ताः प्रजाः प्रजापतिं पितरमेत्योपाव- दन्, उप तं यज्ञक्रतुं जानीहि, येनेष्ट्वा वरुणमप्रीणात् । स प्रीतो वरुणो वरुण- सूर्यम् (तपति) तापयति (पूषणम्) पोषकं सूर्यम् (मरुतः) मृग्रोवतिः (उ० १। ६४) मृङ् प्राणत्यागे—उतिः । अन्तर्गातणिच् । मारयन्ति दोषान् । दोष- नाशकान् वायून् । दुष्टनाशकान् वीरान् (स्वतवसः) स्व+तु हिंसायां पूर्तौ च—असुन् । आत्मबलधारकान् (घोराः) भयानकः (द्यावापृथिव्यौ) प्रका- शमानाप्रकाशमानलोको (प्रतिष्ठे) गौरवरूपे (प्रतिष्ठित्यै) गौरवाय (वाजिनः) अन्नयुक्तान् । बलयुक्तान् (छन्दांसि) वेदमन्त्राः (देवाश्वाः) देवाश्च अश्वाश्च (अभीष्टाः) वाञ्छिताः (परस्तात्) पश्चात् । (पूर्वपक्षे) पूर्वार्धमासे ॥