भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ३ ३०९ होतदतु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्प१तिः । अञ्जसा सत्यमुपगेषं१ स्विते मा धा इत्याह, यथा यजुरेवैतत् ॥ ३ ॥ कण्डिका ३ ॥ यजुर्वेद के मन्त्र के आश्रय से यज्ञ कर्म ॥ ( पंचकृत्वः अवद्यति, पाङ्क्तः यज्ञः, पंचधा हि ते ताः समवाद्यन्त ) पाँच प्रकार से वह [ यजमान ] पराक्रमी होता है, पाँच प्रकार से प्रकाशित यज्ञ है, पाँच प्रकार से ही उन [ देवताओं ] ने उन [ शरीरों ] को समर्थ किया है [ ऊपर क० २ देखो ] । ( आपतये त्वा गृह्णामि इति आह, प्राणः वै आपतिः, प्राणम् एव तेन प्रीणाति ) धनादि प्राप्ति के लिये तुझे मैं ग्रहण करता हूं—यह [ यजुर्वेद मन्त्र भाग ] वह कहता है, प्राण ही अच्छे प्रकार प्रयत्न है, प्राण को ही उससे वह [ यजमान ] तृप्त करता है। ( परिपतये त्वा इति आह, मनः वै परिपतिः, मनः एव तेन प्रीणाति ) सब ओर से ऐश्वर्य के लिये तुझे [ मैं ग्रहण करता हूं—यह भाग ] वह कहता है, मन ही सब ओर से ऐश्वर्य है, मन ही को उससे वह तृप्त करता है । ( तनूनप्त्रे इति आह, ते हि ताः तन्वः समवाद्यन्त ) तनूनप्ता [ शरीर को न गिराने वाले ] के लिये [ तुझे ग्रहण करता हूं—यह भाग ] वह बोलता है, उन [ देवताओं ] ने उन शरीरों को समर्थ किया है । ( शाक्वराय इति आह, शक्तं हि ते ताः समवाद्यन्त ) सामर्थ्य के लिये [ तुझे ग्रहण करता हूं—यह भाग ] वह बोलता है, समर्थ ही वह [ मन ] है, उन्होंने उन [ शरीरों ] को समर्थ किया है । ( शक्मने ओजिष्ठाय इति आह, तत् ओजिष्ठं हि ते आत्मनः समवाद्यन्त ) समर्थ महाबली पुरुष के लिये [ तुझे ग्रहण करता हूं—यह भाग ] वह बोलता है, उससे महाबली को ही उन्होंने अपने से समर्थ किया है । ( अनाधृष्टम् इति आह, अनाधृष्टं हि एतत् ) अपमान नहीं किया गया [ बल है—यह भाग ] वह बोलता है, अपमान नहीं किया गया ही यह [ ब्रह्म बल ] है । ( अनाधृष्यम् इति आह, अनाधृष्यं हि एतत् ) आगे को अपमान के अयोग्य [ बल है—यह भाग ] वह बोलता है, आगे को अपमान के अयोग्य ही यह [ ब्रह्म ३—(पाङ्क्तः) गो० पू० ४ । १४ । पङ्क्ति—अण् । पङ्क्त्या पञ्चप्रकारेण प्रकाशितः (आपतये ) सर्वधातुभ्य इन् ( उ० ४ । ११८ ) आ+पत्लृ गतौ ऐश्वर्य्ये च—इन् । आगमाय । धनादिप्राप्तये ( परिपतये ) पत्यते, ऐश्वर्यकर्मा—निघ० २ । २१ । परि + पत ऐश्वर्ये—इन् । सर्वत ऐश्वर्याय ( तनूनप्त्रे ) क० २ । शरीरस्य न पातयित्रे (शाक्वराय) कॄपृशॄवृञ्श्चतिभ्यः ष्वरच् (उ० २ । १२१) शक्लृ शक्तौ—ष्वरच् । शक्वरः शक्तिमान् । ततो भावे—अण् । शक्तिमत्त्वाय । सामर्थ्याय ( शक्तम् ) समर्थम् ( शक्मने ) अशिशकिभ्यां छन्दसि ( उ० ४ । १४७) शक्लृ शक्तौ—मनिन् । समर्थाय पुरुषाय ( ओजिष्ठाय ) बलवत्तमाय ( अनाधृष्टम् ) अतिरस्कृतम् ( अना- धृष्यम्) अतिरस्करणीयम् ( देवानाम् ) विदुषाम् (ओजः) बलम् ( अभिशस्तिपाः ) अभिशस्तेर्हिंसनात् पाता रक्षिता ( अनभिशस्तेन्यम् ) अनभिशस्ते + णीञ् प्रापणे— १. अस्यां कण्डिकायाम् पू० सं० 'आयतये', 'आयतिः', 'तपस्तपस्यति', 'उपगेषाम्' इति पाठास्तत्रास्माभिः मन्त्रानुसारिणः संशोधिताः ॥ सम्पा० ॥