भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ६ ३१६ उस [ यज्ञ ] का जो घर्म [ पात्र विशेष ] है वह शिश्न [ पुरुष लिङ्ग ] है, जो दो शफ [ उष्ण पदार्थ लेने के लिये काठ के शस्त्र विशेष ] हैं वे दो आण्ड [ अण्डकोश ] हैं, जो दो उपयमनी [ दर्वी वा डोई ] हैं वे दो श्रोणिकपाल [ कटिमध्य के दो खण्ड ] हैं, जो दूध है वह वीर्य है, इसलिये अग्नि देवयोनि [ दिव्य पदार्थों की उत्पत्ति स्थान ] में ब्रह्ममय वीर्यं को गर्भाधान के लिये वह [ यजमान ] धारण करता है । ३ । ( सः अग्निः देवयोनिः ऋङ्मयः, यजुर्मयः, साममयः, ब्रह्ममयः, अमृतमयः, आहुतिमयः, सर्वेन्द्रियः, सम्पन्नः, यजमानः ऊर्ध्वं स्वर्गं लोकम् एति ) वह अग्नि देवयोनि [ समान ] ऋग्वेद युक्त, यजुर्वेद युक्त, सामवेद युक्त, ब्रह्मवेद [ अथर्ववेद ] युक्त, अमृत [ मोक्ष सुख ] युक्त, आहुति [ दान और ग्रहण व्यापार ] युक्त, सब इन्द्रियों वाला और संपत्ति वाला यजमान ऊंचा होकर स्वर्ग लोक पाता है । ४ । [ इन चार वाक्यों को ऐ० ब्रा० १ । २२ से मिलाओ ] ॥ ( तत् आहुः प्रथमयज्ञे प्रवर्ग्यं न कुर्वीत, अनुपनामकाः ह वै उत्तरे यज्ञक्रतवः एनं भवन्ति इति ) लोग यह कहते हैं—प्रथम यज्ञ में प्रवर्ग्य [ यज्ञ ] को न करे, उपनाम बिना ही पिछले यज्ञ कर्म इस [ प्रवर्ग्य ] को प्राप्त होते हैं । ( क मं तु यः अनूचानः श्रोत्रियः स्यात् तस्य प्रवृञ्ज्यात्, सः वै यज्ञस्य आत्मा इति विज्ञायते ) ऐसा ही हो किन्तु जो अनूचान [ अङ्ग उपाङ्गों सहित वेद पढ़ा हुआ ], और श्रोत्रिय [ वेद विहित धर्म जानने वाला ] हो उसके समर्थ होने से [ प्रवर्ग्य करे, ] वह ही यज्ञ का आत्मा है यह जाना गया है । ( अपशिरसा यज्ञेन ह वै एषः यजते, यः अप्रवर्ग्येण यजते ) बिना शिर वाले यज्ञ से ही वह यज्ञ करता है, जो प्रवर्ग्य के बिना यज्ञ करता है । ( यज्ञस्य एतत् ह वै शिरः यत् प्रवर्ग्यः ) यज्ञ का यह ही शिर है जो प्रवर्ग्य है । ( तस्मात् प्रवर्ग्यवता एव याजयेत्, न अप्रवर्ग्येण ) इसलिये प्रवर्ग्यवान् [ यजमान ] से ही यज्ञ करावे, अप्रवर्ग्य वाले से न [ यज्ञ करावे ] । ( तत् अपि एषा अभ्यनूक्ता, चत्वारि शृङ्गा इति) इसलिये यह [ ऋचा ] पढ़ी जाती है—चत्वारि शृङ्गा...... [ देखो गो० पू० २ । १७ ] ॥ ६ ॥ भावार्थः—यज्ञ में यज्ञ विभागों को ठीक ठीक करने से यजमान स्वर्गलोक पाता है ॥ ६ ॥ विशेषः १—यह शब्द शुद्ध किये गये हैं—इच्छन् = इत्थं, ऐ० ब्रा० १ । १८, राष्ट्रत्व = राष्ट्रचेत्व, अथर्व० ४ । १ । २ ॥ आस उपवेशने—विधिलिङ् । उपचरेत् ( आहावप्रतिगरवर्जम् ) युद्धं प्रतिकूलशब्दं च वर्जयित्वा ( अन्तर्धाय ) अन्तर्—दधातेः—ल्यप् । तिरोभूय ( शफौ ) शमु उपशमे—अच्, मस्य फः । उष्णपदार्थग्रहणाय काष्ठनिर्मितशस्त्रभेदौ ( आण्ड्यौ ) स्वार्थे—ण्यत् । अण्डकोशौ ( उपयमनी ) दर्वीद्वयम् ( श्रोणिकपाले ) श्रोणिद्वय- मध्यगतमस्थिद्वयम् ( देवयोन्याम् ) देवानामुत्पत्तिस्थाने ( सम्पन्नः ) सम्पत्तिवान् ( अनुपनामकाः ) उपनामरहिताः ( भवन्ति ) प्राप्नुवन्ति ( कामम् ) अनुमतौ ( प्रवृञ्ज्यात् ) प्र+वृजी वृजि वर्जने—क्यप् । वृजनं बलं—निघ० २ । ६ । सामर्थ्यात् ( अपशिरसा ) विगतमस्तकेन ॥