गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 361, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ८ ।। ३२३ लोकेभ्यः भ्रातृव्यं नुदमानः एति, यः एवं विद्वान् उपसदम् उपैति ) इन सभी लोकों से बैरी को निकालता हुआ वह चलता है जो ऐसा विद्वान् होकर उपसद् [ पास बैठने वा उपासना करने की क्रिया ] को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ भावार्थः—इस कण्डिका में असुर शब्द से भूकम्प, तारापतन आदि उत्पातों और विघ्नों की ओर संकेत है, जिनका बुरा प्रभाव स्थानों और समय पर होता है । बुद्धिमान् लोग ऐसे विघ्नों से बचने के लिये समय समय पर और सायं प्रातः परस्पर विचार करके उपाय करें ॥ ७ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० १ । २३ से मिलाओ । विशेषः २—इस कण्डिका का कुछ आधार यजुर्वेद अ० ५ । म० ८ जान पड़ता है, वह अर्थ सहित यहाँ दिया जाता है । ( या ते अग्नेऽयःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा । या ते अग्ने रजःशया तनू- र्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा । या ते अग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा ॥ ) ( अग्ने ) हे अग्नि ! [ तेजस्वी परमेश्वर ] ( या ते ) जो तेरा ( अयःशया ) सुवर्ण आदिकों में वर्त्तमान ( तनूः ) विस्तृत शरीर ( वर्षिष्ठा ) अत्यन्त बड़ा और ( गह्वरेष्ठा ) गहरे आभ्यन्तर में ठहरा हुआ है, [ उसने ] ( स्वाहा ) उत्तम वेदवाणी से ( उग्रं वचः ) भयंकर वचन को [ संसार में ] ( अप अवधीत् ) नष्ट किया है, ( त्वेषं वचः ) भड़कीले वचन को ( अप अवधीत् ) नष्ट किया है । ( अग्ने ) हे अग्नि ! [ तेजस्वी परमेश्वर ] ( या ते ) जो तेरा ( रजःशया ) लोकों में वर्त्तमान ( तनूः ) विस्तृत शरीर ॰॰॰॰॰॰ नष्ट किया है । ( अग्ने ) हे अग्नि ! ( या ते ) जो तेरा ( हरिशया ) मनुष्य आदि में वर्त्तमान ( तनूः ) विस्तृत शरीर ( वर्षिष्ठा ) अत्यन्त बड़ा और ( गह्वरेष्ठा ) गहरे आभ्यन्तर में ठहरा हुआ है, [ उसने ] ( स्वाहा ) उत्तम वेदवाणी से ( उग्रं वचः ) भयंकर वचन को [ संसार में ] ( अप अवधीत् ) नष्ट किया है, ( त्वेषं वचः ) भड़कीले वचन को ( अप अवधीत् ) नष्ट किया है ॥ कण्डिका ८ ॥ न॑ द्वादशाग्निष्टोमस्योपसदः स्युः, अशान्ता निर्मृं ज्युः१ न॑२ तिस्रोऽहीनस्य, उपरिष्टाद्यज्ञक्रतुर्गरीयानभिषीदेत्, यथा गुरुभारो ग्रीवा निः३श्रोणीयादार्त्तिमार्च्छेत्४ । द्वादशाहीनस्य कुर्य्यात्, प्रत्यू५ तथैव सयत्वाय५ । तिस्रोऽग्निष्टोमस्योपसदः स्युः, शान्ताग्निर्मागाय । ते देवा असुर्य्यान् इमांल्लोकानान्ववैतुमधृष्णुवन् । तानग्निना मुखेनान्ववायन्. यदग्निमनुष्टुप्सदां प्रनीकानि भवन्ति । यथा क्षेत्रपतिः क्षेत्रेऽन्व- वनयन्ति एवमेवैतदग्निना मुखेनेमांल्लोकानभिनयन्तो यन्ति । यो ह वै देवान् साध्यान् वेद, सिद्ध्यत्यस्मै । इमे वाव लोकाः, यत्साध्याः देवाः । स य एवमेतान् १. पू. सं. 'निर्मृज्येरन्' इति पाठः ॥ २. पू. सं. 'न' इति पाठः नास्ति ॥ ३. पू. सं. निःश्रोणीयात् इति पाठः ॥ ४. पू. सं. 'आर्छेदत्' इति पाठः ॥ ५. भ्रष्टोऽयं पाठः प्रतीयते ॥ सम्पा० ॥