गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० २१ १५३ एवापाहि प्रत्नथा......—इससे ब्राह्मणाच्छंसी [ यज करता है, इन तीन मन्त्रों में अभि सहित तृद धातु और इन्द्र शब्द का प्रयोग है ] ॥ ( अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुः—इति पोता, तवायं सोमस्त्वमेह्यर्वाङ्—इति नेष्टा, इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदानाः—इति अच्छावाकः, आपूर्णो अस्य कलशः स्वाहा—इति आग्नीध्रः) अर्वाङेहि...—इस मन्त्र से पोता, तवायं सोम...—इससे नेष्टा, इन्द्राय सोमाः......—इससे अच्छावाक, आपूर्णो अस्य... इससे आग्नीध्र [ यज करता है, यह चार मन्त्र इन्द्र शब्द के प्रयोग वाले हैं ] ॥ ( एवम् उ ह एताः अभितृण्वत्यः भवन्ति ) इस प्रकार [ माध्यन्दिन सवन में प्रयोग से ] ही यह ऋचायें अभितृण्वती [ अभि सहित तृद धातु के प्रयोग वाली ] होती हैं । ( इन्द्रः वै प्रातःसवनं न अभ्यजयत्, सः एताभिः माध्यन्दिनं सवनम् अभ्यतृणत् ) इन्द्र ने ही प्रातःसवन में विजय नहीं पाया, उसने इन ऋचाओं से माध्यन्दिन सवन को वश में किया । ( तत् यत् एताभिः माध्यन्दिनं सवनम् अभ्यतृणत् तस्मात् एताः अभितृण्वत्यः भवन्ति ) सो जो इन ऋचाओं से माध्यन्दिन सवन को उसने वश में किया, इसलिये यह ऋचायें अभितृण्वती [ अभि सहित तृद मारना, अनादर करना धातु के प्रयोग वाली ] हैं ॥ २१ ॥ भावार्थः—कण्डिका २० के अनुसार है ॥ २१ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । ११ से मिलाओ ॥ विशेषः २—( अभितृग्वतीभिः तथा अभितृण्वत्यः ) के स्थान पर ( अभि- तृण्वनीभिः तथा अभितृण्वत्यः ) और ( आर्वाङ् ) के स्थान पर ( अर्वाङ् ) पद ऐतरेय ब्राह्मण से शुद्ध किया है ॥ विशेषः ३—संकेत वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—पिबा सोममभि यमुग्र तर्द ऊर्वं गव्यं महि गृणान इन्द्र । वि यो धृष्णो वधिषो वज्रहस्त विश्वा वृत्रममित्रिया शवोभिः—ऋ० ६ । १७ । १ ॥ ( उग्र इन्द्र,) हे तेजस्वी इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( सोमं पिब ) सोम [ तत्त्वरस ] को पी, ( यम् अभि ) जिस [ सोम ] के लिये ( महि गव्यं गृणानः ) बड़े गोवों के घृत की स्तुति करते हुये तूने ( ऊर्वम् ) मारने योग्य शत्रु को ( तर्दः ) मारा है, ( यः ) जिस तूने ( धृष्णो ) हे निर्भय ! ( वज्रहस्त ) हे वज्र हाथ में रखने वाले ! ( शवोभिः ) अपने बलों से ( विश्वा वृत्रम् अमित्रिया ) सब रोकने वाले बैरियों को ( वि वधिषः ) विशेष करके नाश किया है ॥ न्ययः । अभिभविता । विजेता ( प्रत्नथा ) पूर्वं यथा ( मन्दतु ) हर्षयतु ( अर्वाङ् ) अभिमुखः ( सोमकामम् ) ऐश्वर्यं कामयमानम् (अभ्यतृणत्) अभितः तर्द्दनमकरोत् । दृढबन्धनेन स्थापितवान् (अभितृण्वत्यः) अभिपूूर्वस्य तृदिर्धातोः रूपयुक्ताः ॥ २३ :