गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 400, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १ ॥ प्यासी प्रजाओं को अच्छे प्रकार ठहरा हुआ सम्मान तृप्त करता है, ऐसे ही वह [ वषट्कार ] देवताओं को तृप्त करता है। ( यत् अनुवषट् करोति, तत् अदः यथा एव अश्वान् वा गाः वा पुनरभ्याघारं तर्पयति, एवम् एव तत् देवताः तर्पयति यत् अनुवषट् करोति ) जो वह अनुवषट् [ पीछे से हविस्त्याग ] करता है, सो वह जैसे ही घोड़ों अथवा बैलों को [ यथेष्ट वस्तु देने से ] बार बार यथावत् सींचकर मनुष्य तृप्त करता है, वैसे ही उससे देवताओं को [ यजमान ] तृप्त करता है, जब वह अनुवषट् करता है। ( इमान् एव धिष्ण्यान् अग्नीन् उपासते —इति आहुः, अथ कस्मात् पूर्वस्मिन् एव अग्नौ जुह्वति, पूर्वस्मिन् वषट् करोति = कुर्वन्ति ) [ शंका ] कहते हैं-इन ही धिष्ण्य [ नामवाली ] अग्नियों के समीप वे [ ऋत्विज् ] बैठते हैं, फिर किसलिए पहिली ही अग्नि में वे हवन करते हैं और अनुवषट् करते हैं। [ समाधान ] ( यत् एव-सोमस्याग्ने वीहि इति अनुवषट् करोति, तेन एव वषट् करोति, धिष्ण्यान् प्रीणाति ) जो वह [ यजमान ] हे अग्ने ! तू सोम का भक्षण कर-इस [ ब्राह्मण वचन ] से अनुवषट् करता है, और उससे ही [ सामान्य अग्नि शब्द से ] वह वषट् करता है, उससे धिष्ण्य अग्नियों को प्रसन्न करता है। ( अथ संस्थितान् सोमान् भक्षयन्ति-इति आहुः ) [ शंका ] कहते हैं-फिर संस्थित [ समाप्त किये हुए ] सोमरसों को वे खाते हैं, ( येषाम् अनुवषट् न करोति, सोमस्य कः नु स्विष्टकृद्भागः इति--तत् आहुः ) जिन [ अग्नियों ] का अनुवषट् [ यजमान ] नहीं करता, सोम का कौन सा स्विष्टकृद् भाग [ यज्ञ का समाप्ति सूचक व्यवहार ] है-ऐसा वह कहते हैं। ( यत् एव, सोमस्याग्ने वीहि इति अनुवषट् करोति, तेन एव संस्थितान् सोमान् भक्षयन्ति- इति आहुः ) जो वह-हे अग्नि ! सोम का तू भक्षण कर-इस [ ब्राह्मण वचन ] से वह अनुवषट् करता है और उससे ही वे लोग समाप्त सोमरसों को खाते हैं-ऐसा वह कहते हैं। ( सः उ एषः सोमस्य स्विष्टकृद्भागः यत् अनुवषट् करोति ) वह ही यह सोम का स्विष्टकृद् भाग [ प्रायश्चित्त वा समाप्ति- सूचक मन्त्र ] है, जो वह अनुवषट् [ पीछे से वषट् उच्चारण ] करता है ॥ १ ॥ भावार्थ :-जैसे यज्ञ में वषट्कार, अनुवषट्कार और स्विष्टकृत् का विचार किया जाता है, वैसे ही प्रत्येक काम में मनुष्य को आदि अन्त और मध्य का विचार लेना चाहिये ॥ १ ॥ विशेष: १-इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ३ । ५ से मिलाओ ॥ विशेष: २-निम्नलिखित ब्राह्मण वचन स्विष्टकृत् वा प्रायश्चित्त मन्त्र है- ओ३म् । यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् । अग्निष्टत् स्विष्टकृत् विद्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे । अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्व- अभितः सम्यक् स्थितं कर्म । सत्कृत्यम् ( गाः ) वृषभान् . ( पुनरभ्याघारम् ) पुनः + अभि + आ + घृ सेचने-णमुल् । पुनः पुनः अभिमुखम् आधृत्य यथेष्टवस्तुना संसिच्य ( उपासते ) सेवन्ते ( वीहि ) वी गतिव्याप्तिप्रजननकान्त्यसनखादनेषु- लोट् । भक्षणं कुरु ( संस्थितान् ) समाप्तान् ( सोमान् ) सोमरसान् ( स्विष्टकृत्- भागः ) प्रायश्चित्तमन्त्रस्य यज्ञसमाप्तिसूचकमन्त्रस्य वा पाठः ॥