गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ६ महर्षिः वै यज्ञस्य अग्रे एतत् गेयम् अपश्यत् ) फिर लोग कहते हैं—महर्षि [ बड़े ज्ञानी पुरुष ] ने ही यज्ञ के पहिले [ होने वाले ] इस गाने योग्य वाक्य को देखा। ( तत् यज्ञस्य अग्रे एतत् गेयं, यत् हिङ्कारः ) सो यज्ञ के पहिले यह गाने योग्य वाक्य है, जो हिङ्कार है। (तं देवाः च ऋषयः च अब्रुवन्, अयं वसिष्ठः अस्तु यः नः यज्ञस्य अग्रे गेयम् अद्राक् इति) उस [ महर्षि ] से देव [ विद्वान् ] और ऋषि [ वेदार्थ जानने वाले ] बोले —यह वसिष्ठ [ अत्यन्त निवास कराने वाला वा अत्यन्त जितेन्द्रिय पुरुष ] होवे, जिसने हमारे लिये यज्ञ के पहिले गाने योग्य देखा है। ( तत् यज्ञस्य अग्रे एतत् गेयं यत् हिङ्कारः ) सो यज्ञ के पहिले यह गाने योग्य वाक्य है—जो हिङ्कार है। ( ततः वै सः देवानां श्रेष्ठः अभवत् ) इसलिये ही वह [ हिङ्कार का देखने वाला ] विद्वानों में श्रेष्ठ हुआ है। ( येन वै श्रेष्ठः, तेन वसिष्ठः ) जिस कारण से ही वह श्रेष्ठ है, उसी से वह वसिष्ठ [ अत्यन्त निवास देने वाला ] है। ( तस्मात् यस्मिन् वासिष्ठः ब्राह्मणः स्यात् तं दक्षिणायाः न अन्तरोयात् ) इसलिये जिस [ यज्ञ ] में वासिष्ठ [ वसिष्ठ के देखे हुये हिङ्कार को जानने वाला ] ब्राह्मण होवे, उसको दक्षिणा से पृथक् न करे। ( तथा ह अस्य प्रीतः हिङ्कारः भवति ) इस प्रकार से कि हिङ्कार इसका प्रिय है। ( अथ देवाः च ह वै ऋषयः च यत् ऋक् सामे अपश्यन् ) फिर देवताओं और ऋषियों ने ही जो ऋग्वेद [ पदार्थों की स्तुति विद्या ] और सामवेद [ मोक्ष विद्या ] को देखा है। ( ते ह स्म एते अपश्यन् ) उन्होंने ही इन दोनों को देखा है। ( ते यत्र एते अपश्यन्, ततः एव एनं सर्वं दोहम् अब्दुहन् ) उन्होंने जिस [ ब्रह्मचर्य्यादि व्रत ] में इन दोनों को देखा है, उससे ही उन्होंने इस सब दोहने योग्य पदार्थ [ तत्त्वरस ] को दुहा है। ( ते वै एते दुग्धे यातयामे, ये ऋक्सामे ) वह ही यह दोनों दुहे हुये नियम प्राप्त किये हुये हैं, जो ऋग्वेद और सामवेद हैं। ( ते हिङ्कारेण एव आप्यायते ) वे दोनों हिङ्कार से ही बढ़ते हैं। ( हिङ्कारेण वै आपीने ऋक्सामे यजमानाय दोहं दुहाते ) हिङ्कार से ही बढ़े हुये ऋग्वेद और सामवेद यजमान के लिये दुहने योग्य पदार्थ दुहते हैं [ भरपूर करते हैं ] । ( तस्मात् उ हिङ्कृत्य अध्वर्य्यवः सोमम् अभिषुण्वन्ति ) इसलिये ही हिङ्कार करके अध्वर्यु [ सन्मार्ग बताने वाले ] लोग सोम [ तत्त्व रस ] निचोड़ते हैं। ( हिङ्कृत्य उद्गातारः साम्ना स्तुवन्ति ) हिङ्कार करके उद्गाता [ वेद गाने वाले ] लोग साम [ मोक्ष विद्या ] से स्तुति करते हैं। ( हिङ्कृत्य उक्थशः ऋचा आर्त्विज्यं कुर्वन्ति ) हिङ्कार करके वेदमन्त्र बोलने वाले लोग ऋग्वेद [ पदार्थों की स्तुति विद्या ] से ऋत्विजों का काम करते हैं। ( हिङ्कृत्य अथर्वाणः ब्रह्मत्वं कुर्वन्ति ) हिङ्कार करके प्राप्यते (अहततायै) अविनाशाय (आप्त्यै) पर्याप्त्यै (वीर्य्यवत्तायै) वीरत्वप्राप्तये (सूक्ष॑ति) सूक्षं सत्कारे । सत्करोति ( शकुनिः ) शकुनी । पक्षिणी ( अध्यास्ते ) उपतिष्ठति ( न ) सम्प्रति ( सूयते ) उत्पद्यते ( गेयम् ) गातव्यं वेदम् ( वसिष्ठः ) अतिशयेन निवासकः । अतिशयेन वशी ( अद्राक् ) अद्राक्षीत् ( वासिष्ठः ) दृष्टं साम. ( पा० ४ । २ । ७ ) वसिष्ठ—अण् । वसिष्ठेन दृष्टो हिङ्कारो वासिष्ठः । तदधीते तद्वेद ( पा० ४ । २ । ५६ ) वासिष्ठ—अण् । वासिष्ठवेत्ता । वसिष्ठ—दृष्टहिङ्कारवेत्ता ( यातयामे ) प्राप्तनियमे ( आप्यायते ) प्रवर्धते ( आपीने ) प्रवृद्धे ( उक्थशः ) उक्थानि उक्थैर्वा शंसतीति उक्थशः । मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् ( पा० ३ । २ । ७१ ) उक्थ + शंस