गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १५ ॥ ५९३ अग्नि के समान सभापति और सेनापति दोनों ] को समीप में बुलाता हूं—ऋ० १ । २१ । १ । यह अन्त है । ( इन्द्राग्नी आगतम्—इति यजति ) हे इन्द्र और अग्नि ! तुम दोनों आओ—ऋ० ३ । १२ । १ ।, इससे वह यज्ञ करता है । ( एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्य अनुवषट् करोति ) इन ही दोनों देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है, और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है । ( प्रति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों की स्तुति रहित यज्ञ न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं बढ़ते हैं ] ॥ १५ ॥ भावार्थः—कण्डिका १३ के समान है ॥ १५ ॥ विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—( प्रातर्यावभिरागतं······ऋ० ८ । ३८ । ७ ) इस मन्त्र का अर्थ पृ० ३५२ में किया है, वहीं देखें ॥ २—इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषिता—ऋ० ३ । १२ । १ ॥ ( इन्द्राग्नी ) हे इन्द्र और अग्नि ! [ वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उपदेशक दोनों ] ( गीर्भिः ) वेदवाणियों के साथ ( नभः ) अन्तरिक्ष से ( वरेण्यम् ) स्वीकार करने योग्य ( सुतम् ) पुत्र को ( आ गतम् ) प्राप्त हो, और ( धिया ) श्रेष्ठ बुद्धि से ( इषिता ) ज्ञान देने वाले दोनों ( अस्य ) इस [ पुत्र ] की ( पातम् ) रक्षा करो ॥ ३—तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता । इन्द्राग्नी वाजसातमा—ऋ० ३ । १२ । ४ ॥ ( तोशा ) सन्तुष्ट करने वाले, ( वृत्रहणा ) शत्रुओं के मारने वाले, ( सजित्वाना ) विजयी वीरों सहित रहने वाले, ( अपराजिता ) नहीं हराये गये ( इन्द्राग्नी ) इन्द्र और अग्नि [ सूर्य और बिजुली के समान सभापति और सेनापति दोनों ] को ( हुवे ) मैं बुलाता हूं ॥ ४—इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः । ऋतस्य पथ्या३ अनु—ऋ० ३ । १२ । ७ ॥ ( इन्द्राग्नी ) हे इन्द्र और अग्नि [ वायु और बिजुली के समान सभापति और सेनापति दोनों ] ( धीतयः ) [ हमारे ] कर्म ( अपसः परि ) [ तुम्हारे ] कर्म के सब ओर ( ऋतस्य ) सत्य नियम के ( पथ्याः अनु ) बड़े मार्गों से ( उप प्र यन्ति ) समीप में अच्छे प्रकार चलते हैं ॥ ५—इहेन्द्राग्नी उपह्वये तयोरित्स्तोममुश्मसि । ता सोमं सोमपातमा—ऋ० १ । २१ । १ ॥ ( इह ) यहां पर ( इन्द्राग्नी ) इन्द्र और अग्नि [वायु और अग्नि के समान सभापति और सेनापति दोनों ] को ( उप ह्वये ) समीप में बुलाता हूं, ( तयोः इत् ) उन दोनों की ही ( स्तोमम् ) गुण प्रशंसा ( उश्मसि ) हम चाहते हैं । ( ता ) वे दोनों ( सोमम् )
( हुवे ) आह्वयामि ( अपसः ) कर्मणः—निघ० २ । १ ( परि ) सर्वतः । अन्यद् गतम्—क० १३ ॥