गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २० ॥ वासः ददाति, तेन बृहस्पतिम् ) जो वह वस्त्र देता है, उससे वह बृहस्पति [ बड़े बड़ों के पालन करने वाले गुण, बढ़ाता है ] । ( यत् हिरण्यं ददाति, तेन वर्षीयः आयुः कुरुते ) जो वह सुवर्ण देता है, उससे वह अति बड़ा जीवन करता है । ( यत् अश्वं ददाति, सौर्यः वै अश्वः, तेन सूर्यस्य एव प्रियं धाम उपैति ) जो वह घोड़ा देता है, सूर्य के गुण वाला [ वेगवान् ] ही घोड़ा है, उससे वह सूर्य का ही प्रिय तेज पाता है । ( अन्ततः प्रतिहर्त्रे देयम् ) अन्त में प्रतिहर्त्ता [ द्वारपाल, ऋत्विज् ] के लिये दान है । ( रौद्रः वै प्रतिहर्त्ता, तत् रुद्रम् एव निरवजयति ) उग्र स्वभाव वाला ही प्रतिहर्त्ता है, उससे वह उग्र स्वभाव को ही निकाल कर जीतता है । ( यत् मध्यतः प्रतिहर्त्रे दद्यात्, मध्यतः रुद्रम् अन्ववयजेत् ) जो वह बीच से प्रतिहर्त्ता को देवे, बीच से वह उग्र स्वभाव को सर्वथा निकाल देवे । ( आसुरिः वै स्वर्भानुः सूर्य्यं तमसा अविध्यत् ) आसुरि [ मेघ से उत्पन्न ], आकाश में दिखाई देने वाले [ राहु अर्थात् अन्धकार ] ने सूर्य को अन्धकार द्वारा छेद डाला । ( तत् अत्रिः अपनुनोद ) उसको अत्रि [ नित्य ज्ञानी परमेश्वर ] ने हटा दिया, ( तत् अत्रिः अन्वपश्यत् ) उसको अत्रि ने [ नित्य ज्ञानी परमेश्वर ने वेद में ] दिखा दिया है [ देखो गो० पू० २ । १७ ] । ( यत् आत्रेयाय हिरण्यं ददाति तेन तमः एव अपहते ) जो वह आत्रेय [ अत्रि, नित्य ज्ञानी परमेश्वर के मानने वाले ब्राह्मण ] को सुवर्ण देता है, उससे वह अन्धकार ही हटाता है। ( अथो स्वर्गस्य लोकस्य समष्ट्यै ज्योतिः उपरिष्टात् धारयति ) फिर वह स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये ज्योति [ अपने ] ऊपर धारण करता है ॥ १६ ॥ भावार्थः—दानी पुरुष दान पदार्थों के गुण जानकर दानग्रहीता की योग्यता के अनुसार उनका दान करे ॥ १६ ॥ विशेषः—एकाह यज्ञ के प्रातःसवन का विषय कण्डिका १२ से चलकर अब कण्डिका १६ पर समाप्त हुआ ॥ कण्डिका २० ॥ अथात एकाहस्यैव माध्यन्दिनम् । ऋक् च वा इदमग्रे साम वास्तां, सैव नामर्गासीत्, अमो नाम साम, सा वा ऋक् सामोपावदत्, मिथुनं सम्भवाव रथम् ( बृहस्पतिम् ) बृहतां महतां पालकं गुणम् ( वर्षीयः ) प्रियस्थिरस्फिरोरु० ( पा० ६ । ४ । १५७ ) वृद्ध-ईयसुन् । अतिवृद्धम् । बहुदीर्घम् ( प्रतिहर्त्रे ) द्वारपाल- काय । ऋत्विग्विशेषाय ( रौद्रः ) उग्रस्वभावयुक्तः ( रुद्रम् ) उग्रगुणम् ( अन्व- वयजेत् ) अनु निरन्तरम् अवयजेत् । दूरं कुर्यात् ( स्वर्भानुः ) दाभाभ्यां नुः ( उ० ३ । ३२ ) स्वः+भा दीप्तौ—नुः । स्वः, आकाशे भाति दीप्यते असौ । राहुः । अंध- कारकर्ता ( आसुरिः ) अत इन् ( पा० ४ । १ । ९५ ) असुर—इञ् । असुरो मेघः— निघ० १ । १० । मेघोत्पन्नो ऽन्धकारः ( अत्रिः ) गो० पू० २ । १७ । सदा ज्ञानवान् परमात्मा ( अपनुनोद ) दूरीकृतवान् ( अन्वपश्यत् ) निरन्तरं दर्शितवान् वेदे ( आत्रेयाय ) अत्रेः सदा ज्ञानवतः परमेश्वरस्य सेवकाय ( अपहते ) ओहाक् त्यागे इत्यस्य रूपम् । अपत्यजति ।