गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २० ४०३ और प्रस्ताव [ प्रस्तोता का गान ] ३, प्रथमा [ पहिली ऋचा ] ४. और उद्गीथ [ उद्गाता का गान ] ५. और मध्यमा [ बीच वाली ऋचा ] ६, और प्रतिहार [ प्रतिहर्ता का गान ] ७, और उत्तमा [ सबसे पिछली ऋचा ] ८, और निधन [ अन्त में गान का भाग ] ९, और वषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] १०, । ( ते यत् पञ्च अन्यत् भूत्वा पञ्च अन्यत् भूत्वा कल्पेताम्, तस्मात् आहुः, पाङ्क्तः यज्ञः पाङ्क्ताः पशवः इति ) जो वे दोनों [ कारण और कार्यरूप ऋक् ] पांच एक प्रकार से [ कारण रूप पृथिवी जल तेज वायु आकाश ] होकर और पांच दूसरे प्रकार से [ कार्यरूप पृथिवी जल तेज वायु आकाश ] होकर समर्थ होते हैं, इसलिये वे [ ऋषि ] कहते हैं—पाङ्क्त [ पङ्क्ति अर्थात् विस्तार और गौरव वाला अथवा दस अवयव वाला ] यज्ञ है और पाङ्क्त [ दश अर्थात् पांच ज्ञाने- न्द्रिय पांच कर्मेन्द्रिय वाले ] पशु [ जीव ] हैं । ( यत् उ दशनीं विराजम् अभि सम्पद्ये- ताम्, तस्मात् आहुः, दशम्यां विराजः यज्ञः प्रतिष्ठितः इति ) और जो वे दोनों दशनी [ दश अक्षर वाले ] विराट् छन्द को लक्ष्य में करके [ यज्ञ करने में ] समर्थ होते हैं, इसलिये वे कहते हैं—दश अक्षर वाली विराट् में यज्ञ ठहरा हुआ है। ( यत् उ बृहत्यतः प्रतिपद्यते, बार्हतः वै एषः, यः एषः तपति, तत् एनं स्वेन रूपेण समर्धयति ) जो वह [ यज्ञ ] बृहती छन्द से सिद्ध होता है, बृहती [ वृद्धि ] वाला ही यह है जो यह [ यज्ञ ] तपता है, इसलिये इस [ यजमान ] को अपने रूप से वह [ यज्ञ ] समृद्ध करता है । ( द्वे तिस्रः करोति ) वह [ ब्रह्म ] दो [ कारण और कार्यरूप प्रकृति ] को तीन [ सत्त्व रज और तम रूप ] करता है । ( पुनः प्रजायै रूपम् आदाय द्वौ इव अग्रे भवतः ) फिर संतान उत्पत्ति के लिये रूप ग्रहण करके दो ही पहिले होते हैं । ( ततः उप- प्रजायते ) उससे वह [ सन्तान ] उत्पन्न होता है ॥ २० ॥ भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि कार्य और कारण का परस्पर सम्बन्ध विचार कर अपना कर्तव्य सिद्ध करें ॥ २० ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ३ । २३ से मिलाओ ॥ विशेषः २—( तस्मात् एकस्य बह्व्यः जायाः भवन्ति, एकस्याः बहवः पतयः सह न ह ) इसलिये एक पुरुष के बहुत पत्नियां होती हैं, और एक पत्नी के बहुत पति एक साथ नहीं होते—यह मत वेद विरुद्ध है । यहां ब्राह्मण में भी प्रकरण तीन का था बहुत का नहीं । वेद में एक पुरुष को एक पत्नी और एक पत्नी को एक पति एक समय में रखने का विधान है । वह हीं मन्त्र, जो इस आख्यायिका का आधार जान पड़ता है लिखा जाता गातव्यो भागः ( पाङ्क्तः ) पचि विस्तारे व्यक्तीकरणे च—क्तिन् । पङ्क्ति—अण् । पङ्क्त्या विस्तारेण गौरवेण वा युक्तः । अथवा पङ्क्तिः दशसंख्यायाम् । दशावय- वोपेताः ( पाङ्क्ताः ) विस्तारयुक्ताः । दशेन्द्रिययुक्ताः ( दशनीम् ) लोमादि- पामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः ( पा० ५ । २ । १०० ) दश—नप्रत्ययो मत्वर्थीयः, ङीप् । दशिनीम् । दशाक्षरयुक्तम् ( अभि ) अभिलक्ष्य ( विराजं ) विराजि ( दशम्याम् ) दशाक्षरायाम् ( बृहत्यतः ) बृहतीच्छन्दसः ( प्रतिपद्यते ) सिध्यति ( बार्हतः ) बृहती—अण् । वृद्धियुक्तः ( आदाय ) गृहीत्वा ॥