भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 600 में से

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पृष्ठ 447

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २३ ४०६ ब्राह्मणाच्छंसी पीछे से बोलता है, वे दोनों [ दोनों के स्तोत्र ] इन्द्र देवता वाले हैं। ( ऐन्द्राग्नं तृचं प्रउगे होता शंसति, ऐन्द्राग्नम् अच्छावाकः अनुशंसाति, तत् उभयम् ऐन्द्राग्नम् ) इन्द्र और अग्नि देवता वाले तृच को प्रउग यज्ञ में होता बोलता है और इन्द्र और अग्नि देवता वाले [ तृच ] को अच्छावाक पीछे से बोलता है, वह दोनों [ दोनों का स्तोत्र ] इन्द्र और अग्नि देवता वाला है। ( अथ ह एनत् केवलम् एव इन्द्रस्य यत् मरुत्वतीयात् ऊर्ध्वम् ) फिर यह इन्द्र का ही केवल [ सेवनीय स्वरूप ] है, जो मरुत्व- तीय [ यज्ञ ] से ऊपर है। ( तस्मात् सर्वे निष्केवल्यानि शंसन्ति ) इसलिये सब [ याजक ] निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्रों ] को बोलते हैं। ( यत् एव निष्केवल्यानि तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपं, यत् उ एव निष्केवल्यानि ) जो ही निष्केवल्य [ स्तोत्र ] हैं, वह स्वर्ग लोक का रूप है, क्योंकि यह ही निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्र ] हैं। ( यदेददेवीरसहिष्ट माया अथाभवत् केवलः सोमो अस्य-इति ऋचा अभ्यनूक्तम् ) ( यदा इत् ) जब ही ( अदेवीः ) विद्वानों के विरुद्ध [ आसुरी ] ( मायाः ) मायाओं [ छल कपट क्रियाओं ] को ( असहिष्ट ) उसने जीत लिया, ( अथ ) तब ही ( सोमः ) सोम [ अमृत रस अर्थात् मोक्षसुख ] ( अस्य ) उस [ पुरुषार्थी ] का ( केवलः ) सेवनीय ( अभवत् ) हुआ है [ अथ० २० । ८७ । ५ पाद ३, ४ ]—इस ऋचा करके अनुकूल कहा गया है। (यज्ञं तन्वानान् देवान् असुररक्षांसि अजिघांसन् ) यज्ञ को फैलाते हुए देवताओं को असुर राक्षसों ने मारना चाहा। ( वामदेवम् अब्रुवन्, त्वं दक्षिणतः नः इमं यज्ञं गोपाय इति, वसिष्ठम् मध्यतः, भरद्वाजम् उत्तरतः, अनु विश्वामित्रं सर्वान् ) वे वामदेव [ उत्तम विद्वान् ] से बोले—तू दक्षिण से हमारे इस यज्ञ की रक्षा कर, वसिष्ठ से [ अति श्रेष्ठ पुरुष से, वे बोले ]—बीच से [ रक्षा कर ], भरद्वाज से [ अन्न वा ज्ञान धारण करने वाले पुरुष से बोले ]—उत्तर से [ रक्षा कर ] और पीछे से विश्वामित्र से [ सबके मित्र पुरुष से बोले ]—सबों की [ सब यज्ञों की ] [ रक्षा कर ]। ( तस्मात् मैत्रावरुणः वामदेवात् न प्रच्यवते, ब्राह्मणाच्छंसी वसिष्ठात्, अच्छावाकः भरद्वाजात्, सर्वे विश्वामित्रात् ) इसलिये मित्र और वरुण देवता वाला ऋत्विज् वामदेव [ श्रेष्ठ विद्वान् ] से नहीं बढ़ कर जाता है, ब्राह्मणाच्छंसी [ वेद से स्तुति करने वाला ऋत्विज् ] वसिष्ठ [ अति श्रेष्ठ पुरुष ] से, अच्छावाक [ अच्छा उच्चारण करने वाला ऋत्विज् ] भरद्वाज [ बहुत अन्न वा ज्ञान रखने वाले पुरुष ] से, और सब [ ऋत्विज् ] विश्वामित्र से [ सबके मित्र पुरुष से नहीं बढ़ कर जाते हैं अर्थात् सब समान ऋत्विज् हैं ] । ( अस्मै एव तत् एते ऋषयः अहरहः नमर्गाः अप्रमत्ताः यज्ञं रक्षन्ति, यः एवं वेद यः एवं वेद ) उस पुरुष के लिये ही तब यह ऋषि लोग दिन दिन न मरते हुये [ अमर ] और अप्रमत्त [ भूल चूक बिना ] होकर श्रेष्ठं पुरुषम् ( भरद्वाजम् ) अन्नस्य ज्ञानस्य वा धर्त्तारम् ( विश्वामित्रम्·) सर्वस्य मित्रम् ( न ) निषेधे ( प्रच्यवते ) च्युङ् गतौ । प्रकर्षेण गच्छति ( नमर्गाः ) गन् गम्यद्योः ( उ० १ । १२३ ) नञ् + मृङ् प्राणत्यागे—गन् । अमर्गाः । अमृताः ( अप्रमत्ताः ) प्रमादरहिताः ॥