भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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४१२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १ २—कया त्वं न ऊत्याऽभि प्र मन्दसे वृषन् । कया स्तोतृभ्य आ भर— ऋग्० ८ । ९३ [ सायण भाष्य ८२ ] । १६, साम० उ० ७ । ३ । ७ ॥ ( वृषन् ) हे बलवान् ! [ परमेश्वर ] (त्वम्) तू ( कया ) कमनीय वा सुखदायक ( ऊत्या ) रक्षा से ( नः ) हमें ( अभि ) सब ओर से ( प्र मन्दसे ) आनन्द देता है, ( स्तोतृभ्यः ) स्तुति करने वालों को ( कया ) कमनीय वा सुखदायक [ रक्षा ] से ( आ भर ) भरपूर कर ॥ ३—कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति । श्रद्धा इत्ते मघवन् पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति—ऋग्० ७ । ३२ । १४ ॥ ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( कः मर्त्यः ) कौन मनुष्य ( तम् ) उस ( त्वावसुम् ) तुझसे पाये हुए धन वाले को ( आ दधर्षति ) तिरस्कार करता है। ( मघवन् ) हे महाधनी ! ( ते ) तेरे लिये ( श्रद्धा इत् ) श्रद्धा से ही ( पार्ये दिवि ) पालने योग्य व्यवहार में ( वाजी ) विज्ञानी पुरुष ( वाजम् ) विज्ञान को ( सिषासति ) बांटना चाहता है ॥ ४—सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः प्र भर्त्तुमावदन्धसः सुतस्य । साधोः पिब प्रतिकामं यथा ते रसाशिरः प्रथमं सोम्यस्य—ऋग्० ३ । ४८ । १ ॥ ( सद्यः ह ) शीघ्र ही ( जातः ) प्रकट हुये, ( कनीनः ) प्रकाशमान, ( वृषभः ) सुखों की वर्षा करने वाले [ आप, हे इन्द्र राजन् ! ] ( प्रभर्त्तुम् ) अच्छे प्रकार पालन करने के लिये ( सुतस्य अन्धसः ) सिद्ध किये हुये अन्न की ( आवत् ) रक्षा करें । ( रसाशिरः ) रसों का खाने वाला तू ( प्रतिकामम् ) प्रत्येक कामना में, ( यथा ते ) जैसे तेरे लिये हो, ( साधोः ) सिद्धि करने वाले ( सोम्यस्य ) सोम [ ऐश्वर्य ] में उत्पन्न रस का ( प्रथमम् ) पहिले ( पिब ) पान कर ॥ ५—एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः । महामुभे रोदसी वृद्धमृष्वं निरेकमिद् वृणते वृत्रहत्ये—ऋग्० ४ । १६ । १ ॥ ( वज्रिन् ) हे प्रशंसित शस्त्र अस्त्र वाले ( इन्द्र ) इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( अत्र एव ) यहां पर ही ( सुहवासः ) अच्छे प्रकार पुकारने वाले ( ऊमाः ) रक्षा करने वाले ( विश्वे ) सब ( देवासः ) विद्वान् लोग, ( उभे रोदसी ) दोनों सूर्य और भूमि [ के समान वर्त- मान ] ( महाम् ) महान् ( वृद्धम् ) वृद्ध [ विद्यावृद्ध ], ( ऋष्वम् ) श्रेष्ठ ( एकम् इत् ) अकेले ही ( त्वाम् ) तुझको ( वृत्रहत्ये ) शत्रुओं के नाश वाले संग्राम में ( निः वृणते ) निरन्तर चुन लेते हैं ॥ ६—उशन्नु षु णः सुमना उपाके सोमस्य नु सुषुतस्य स्वधावः । पा इन्द्र प्रति- भृतस्य मध्वः समन्धसा ममदः पृष्ठचेन—ऋग्० ४ । २० । ४ ॥ ( नः उ.सु उशन् ) हे हमको निश्चय करके अच्छे प्रकार चाहने वाले ! ( स्वधावः ) हे उत्तम अन्न वाले ! ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( सुमनाः ) प्रसन्न चित्त वाला तू ( उपाके ) समीप में ( सुषुतस्य ) अच्छे प्रकार निचोड़े गये ( सोमस्य ) सोम [ ऐश्वर्य युक्त पदार्थ ] की ( नु ) शीघ्र ( पाः ) रक्षा कर, और ( प्रतिभृतस्य ) प्रत्यक्ष पुष्ट किये हुये ( मध्वः ) मधु [ उत्तम ज्ञान ] के ( पृष्ठचेन ) पीछे होने वाले सुख से ( अन्धसा ) अन्न के साथ ( सं ममदः ) अच्छे प्रकार आनन्द कर ॥